गिरीश गुप्ता गरियाबंद: छत्तीसगढ़ में बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य और शुरुआती शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए आंगनबाड़ी केंद्रों का संचालन किया जा रहा है। सरकार की ओर से बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए कई योजनाएं भी चलाई जा रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से अलग नजर आ रही है। हालात यह हैं कि देवभोग ब्लॉक के कई आंगनबाड़ी केंद्रों के पास आज भी अपना भवन नहीं है। छोटे-छोटे बच्चों को किराए के मकानों, जर्जर भवनों और उधार के कमरों में बैठकर पढ़ाई और पोषण आहार लेना पड़ रहा है।
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, संबंधित ब्लॉक में 40 से अधिक आंगनबाड़ी केंद्र आज भी किराए के भवनों में संचालित हो रहे हैं। इनमें कई केंद्र ऐसे हैं, जहां बच्चों के बैठने, खेलने और पढ़ने के लिए पर्याप्त जगह तक उपलब्ध नहीं है। कुछ केंद्र खपरैल मकानों में चल रहे हैं, तो कुछ जगहों पर भवनों की हालत इतनी खराब है कि बुनियादी सुविधाएं जुटाना भी मुश्किल हो रहा है।
13 कलेक्टर बदले, लेकिन समस्या जस की तस
सबसे गंभीर सवाल प्रशासनिक व्यवस्था और महिला एवं बाल विकास विभाग की कार्यप्रणाली पर उठाए गए हैं। वर्षों से आंगनबाड़ी भवनों की समस्या बनी हुई है। इस दौरान गरियाबंद जिले में कई कलेक्टरों का कार्यकाल पूरा हो गया और नए अधिकारी भी आए, लेकिन बच्चों को अपने आंगनबाड़ी भवन की सुविधा नहीं मिल सकी।
आंगनबाड़ी केंद्र केवल बच्चों को बैठाने की जगह नहीं हैं, बल्कि यहां बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा, पोषण आहार, स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं और गर्भवती महिलाओं को जरूरी परामर्श दिया जाता है। ऐसे में यदि केंद्रों के पास सुरक्षित और पर्याप्त भवन नहीं होंगे, तो इन योजनाओं का लाभ प्रभावित होना स्वाभाविक है।
500 रुपये किराए में सर्वसुविधायुक्त भवन मिलना मुश्किल
आंगनबाड़ी केंद्रों के संचालन में किराए के मकानों पर निर्भरता भी एक बड़ी समस्या बन गई है। रिपोर्ट में 500 रुपये मासिक किराए का भी उल्लेख किया गया है। इतनी कम राशि में ऐसा मकान मिलना मुश्किल है, जहां बच्चों के बैठने, रसोई, पेयजल और शौचालय जैसी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हों।
कई मकान मालिक भी इतनी कम राशि में भवन देने से बचते हैं। दूसरी ओर, जिन मकानों में केंद्र संचालित हो रहे हैं, वहां बच्चों की जरूरतों के अनुरूप व्यवस्था करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
स्वीकृत भवनों का निर्माण भी अधूरा
सबसे चिंताजनक स्थिति उन आंगनबाड़ी भवनों की है, जिन्हें निर्माण के लिए स्वीकृति मिल चुकी है, लेकिन उनका काम अब तक पूरा नहीं हो पाया है। रिपोर्ट के अनुसार, करीब दो साल पहले स्वीकृत कुछ आंगनबाड़ी भवन अभी भी अधूरे हैं। इसके कारण बच्चों को किराए के मकानों में ही बैठना पड़ रहा है।
वित्तीय वर्ष 2024-25 और 2025-26 के दौरान कुल 19 आंगनबाड़ी भवन स्वीकृत किए जाने का भी उल्लेख किया गया है। इसके बावजूद निर्माण कार्य की धीमी रफ्तार और अधूरे भवनों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
बच्चों की सुविधाओं पर उठ रहे सवाल
आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों को सुरक्षित वातावरण मिलना जरूरी है। लेकिन जब केंद्रों का संचालन छोटे, जर्जर या असुविधाजनक मकानों में होता है, तो बच्चों की गतिविधियों पर असर पड़ता है। कई जगह पर्याप्त जगह नहीं होने से बच्चों के बैठने और खेलने की व्यवस्था भी प्रभावित होती है।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को भी सीमित संसाधनों में काम करना पड़ रहा है। पोषण आहार वितरण से लेकर बच्चों की उपस्थिति, स्वास्थ्य और प्रारंभिक शिक्षा तक की जिम्मेदारी निभाने वाली कार्यकर्ताओं के सामने भवन की समस्या अतिरिक्त परेशानी पैदा करती है।
विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल
सवाल यह है कि जब वर्षों से आंगनबाड़ी भवनों की कमी की जानकारी विभाग और प्रशासन को है, तो अब तक स्थायी समाधान क्यों नहीं निकल पाया? स्वीकृत भवनों का निर्माण समय पर पूरा क्यों नहीं हो रहा? किराए के मकानों में संचालित केंद्रों को पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी किसकी है?
आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थिति में सुधार के लिए केवल योजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि स्वीकृत भवनों का निर्माण समयसीमा में पूरा कराया जाए और किराए के भवनों में संचालित केंद्रों को भी बच्चों के अनुकूल बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
आखिरकार, आंगनबाड़ी केंद्रों में पढ़ने वाले बच्चे ही देश और प्रदेश का भविष्य हैं। उन्हें आज भी अपने सिर पर पक्की छत का इंतजार करना पड़े, तो यह व्यवस्था के लिए गंभीर सवाल है।

