सहमति और रिश्ते की प्रकृति को बताया अहम
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि यदि दो वयस्क अपनी स्वतंत्र इच्छा और सहमति से लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं तथा आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाते हैं, तो हर ऐसे मामले को स्वतः दुष्कर्म (रेप) नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।
क्या था मामला?
मामला एक ऐसे जोड़े से जुड़ा था, जो लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा था। बाद में महिला की शिकायत पर दुष्कर्म का मामला दर्ज किया गया। आरोपी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि दोनों के बीच संबंध आपसी सहमति से थे और वे लंबे समय तक साथ रहे थे। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और दोनों पक्षों के तथ्यों पर विचार किया।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
अदालत ने कहा कि यदि संबंध पूरी तरह सहमति पर आधारित थे और यह साबित नहीं होता कि सहमति धोखे, दबाव या झूठे विवाह के वादे के कारण प्राप्त की गई थी, तो केवल संबंध टूट जाने के आधार पर दुष्कर्म का अपराध स्वतः नहीं बनता। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में प्रत्येक मामले के तथ्यों की अलग-अलग जांच आवश्यक है।
कानून की व्याख्या पर जोर
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि भारतीय दंड कानून के तहत दुष्कर्म के मामलों में सहमति, परिस्थितियां और आरोपी की मंशा जैसे पहलुओं का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया जाना चाहिए। केवल लिव-इन रिलेशनशिप का समाप्त होना या बाद में विवाद उत्पन्न होना अपने आप में दुष्कर्म साबित नहीं करता।
फैसले का महत्व
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामलों में सहमति की कानूनी अवधारणा को स्पष्ट करता है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी मामले में धोखाधड़ी, जबरदस्ती या झूठे वादे के जरिए सहमति प्राप्त की गई हो, तो परिस्थितियां अलग होंगी और कानून उसी के अनुसार लागू होगा।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के इस फैसले ने स्पष्ट किया है कि लिव-इन रिलेशनशिप में बने सहमति आधारित शारीरिक संबंधों को हर स्थिति में दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। हालांकि, अदालत ने यह भी दोहराया कि प्रत्येक मामले का फैसला उसके अपने तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाएगा।

