सुकमा। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सुकमा जिले से स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत को सामने लाने वाली तस्वीरें सामने आई हैं। जिले के एलंपल्ली गांव में एक 45 वर्षीय बीमार महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए परिजनों को खाट का सहारा लेना पड़ा। महिला की तबीयत खराब होने के बाद उसे अस्पताल ले जाने के लिए वाहन की व्यवस्था नहीं हो सकी, जिसके बाद परिजन खाट को ही एंबुलेंस बनाकर कई किलोमीटर तक पैदल चल पड़े।
इस घटना का वीडियो और तस्वीरें सामने आने के बाद स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। जिस इलाके में आज भी मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए खाट और कंधों का सहारा लेना पड़ रहा है, वहां सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं और आपातकालीन परिवहन व्यवस्था की स्थिति पर गंभीर चर्चा शुरू हो गई है।
तीन दिन से बुखार से पीड़ित थी महिला
जानकारी के मुताबिक, 45 वर्षीय माड़वी पाले पिछले करीब तीन दिनों से बुखार से पीड़ित थीं। बताया गया कि समय के साथ उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। हालत ज्यादा खराब होने पर उन्हें अस्पताल ले जाने की जरूरत महसूस हुई।
परिजनों के सामने सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि बीमार महिला को गांव से अस्पताल तक कैसे पहुंचाया जाए। स्थानीय स्तर पर तत्काल वाहन की सुविधा नहीं मिल सकी। इसके बाद परिवार के लोगों ने महिला को खाट पर बैठाया/लिटाया और उसे कंधों पर उठाकर अस्पताल की ओर निकल पड़े।
पूरे प्रदेश को छोड़ अगर
विकास एक ही जगह सीमित
हो जाए तो वो विकास नहीं
सूजन है,
सुकमा के एलंपल्ली से आई तस्वीर
स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली
पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लगा रही है,
एंबुलेश खराब होने की वजह से
45 वर्षीय बीमार महिला को
खाट में बिठा कई किलोमीटर दूर
हॉस्पिटल पहुंचाया गया। pic.twitter.com/LeWWdV1RPA
— CG_04 (@CG_wasi) September 9, 2026
खाट को बनाया एंबुलेंस, कई किलोमीटर पैदल चले परिजन
सामने आई तस्वीरों में परिजन महिला को खाट के सहारे ले जाते दिखाई दे रहे हैं। कई लोग बारी-बारी से खाट को अपने कंधों पर उठाकर आगे बढ़ते नजर आए।
ग्रामीण इलाकों में सड़क और परिवहन की समस्या नई नहीं है, लेकिन जब किसी गंभीर रूप से बीमार मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस के बजाय खाट का सहारा लेना पड़े तो यह तस्वीर व्यवस्था पर कई सवाल खड़े करती है।
परिजनों को महिला को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए काफी दूरी तय करनी पड़ी। इस दौरान उन्हें रास्ते में कई परेशानियों का सामना करना पड़ा।
एंबुलेंस को लेकर सामने आई अलग-अलग जानकारी
इस मामले में एंबुलेंस की उपलब्धता को लेकर अलग-अलग जानकारी सामने आई है। रिपोर्टों के अनुसार संबंधित एंबुलेंस वाहन कुछ दिनों से खराब होने की बात सामने आई है। वहीं एंबुलेंस चालक की ओर से यह भी कहा गया कि परिजनों ने एंबुलेंस के लिए फोन नहीं किया था।
ऐसे में पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से जांच जरूरी है। सवाल यह है कि अगर गांव में आपात स्थिति में मरीज को अस्पताल ले जाने की जरूरत पड़े तो तत्काल परिवहन सुविधा उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी किसकी है और उस समय वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं हो सकी?
नक्सल प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य व्यवस्था बड़ी चुनौती
सुकमा जैसे आदिवासी और नक्सल प्रभावित जिले में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना हमेशा से बड़ी चुनौती रहा है। जिले के कई दूरस्थ गांवों में अस्पताल तक पहुंचने के लिए ग्रामीणों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
बरसात और खराब सड़क की स्थिति में यह परेशानी और बढ़ जाती है। ऐसे इलाकों में एंबुलेंस जैसी आपातकालीन सेवा की उपलब्धता मरीजों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
किसी मरीज की हालत गंभीर होने पर शुरुआती कुछ घंटे बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। ऐसे में वाहन की अनुपलब्धता या खराब सड़क की वजह से अस्पताल पहुंचने में देरी मरीज की परेशानी को और बढ़ा सकती है।
तस्वीरों ने खड़े किए कई सवाल
एलंपल्ली से सामने आई तस्वीरें अब सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई हैं। तस्वीर में परिजन बीमार महिला को खाट पर ले जाते दिखाई दे रहे हैं। इसे लेकर लोग स्वास्थ्य विभाग की व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं।
लोगों का सवाल है कि सरकारी योजनाओं और स्वास्थ्य सुविधाओं के बावजूद दूरस्थ इलाकों में मरीजों को आज भी इस तरह अस्पताल क्यों पहुंचाना पड़ रहा है?
हालांकि, इस घटना को लेकर स्वास्थ्य विभाग की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने के बाद ही एंबुलेंस की वास्तविक स्थिति और मामले की पूरी जिम्मेदारी स्पष्ट हो सकेगी।
क्या हर मरीज के लिए उपलब्ध है आपातकालीन परिवहन?
इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल आपातकालीन स्वास्थ्य परिवहन व्यवस्था को लेकर है। दूरस्थ गांवों में अगर एंबुलेंस खराब हो जाए तो उसके स्थान पर वैकल्पिक वाहन की व्यवस्था कितनी जल्दी की जाती है? क्या संबंधित क्षेत्र में बैकअप एंबुलेंस उपलब्ध है? और अगर किसी ग्रामीण को तत्काल अस्पताल ले जाने की जरूरत हो तो उसे किस नंबर पर संपर्क करना चाहिए?
इन सवालों का जवाब स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन को देना होगा।
स्वास्थ्य व्यवस्था के दावों के बीच जमीनी तस्वीर
सरकार की ओर से ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयास किए जाते हैं। लेकिन एलंपल्ली की यह तस्वीर बताती है कि योजनाओं और जमीनी स्तर पर उनकी उपलब्धता के बीच अभी भी अंतर हो सकता है।
एक 45 वर्षीय महिला को बुखार की हालत में अस्पताल पहुंचाने के लिए परिजनों को खाट उठाकर कई किलोमीटर चलना पड़ा। यह केवल एक परिवार की परेशानी नहीं, बल्कि दूरस्थ इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं और परिवहन की पहुंच को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है।
अब जरूरत है कि संबंधित अधिकारी इस मामले की वास्तविक स्थिति की जांच करें और यह सुनिश्चित करें कि भविष्य में किसी बीमार मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए परिजनों को खाट या कंधों का सहारा न लेना पड़े।
एलंपल्ली की यह तस्वीर फिलहाल एक बड़ा सवाल छोड़ रही है—अगर आपात स्थिति में एंबुलेंस ही उपलब्ध न हो, तो दूरदराज के गांवों में मरीज आखिर कितनी दूर तक खाट के सहारे अस्पताल पहुंचाए जाएंगे?

