तकनीक और इंटरनेट ने दुनिया को सुविधाओं और संभावनाओं से जोड़ा है, लेकिन इसके साथ अपराध की कई ऐसी भयावह राहें भी खुली हैं, जिनका अंदाजा लगाना मुश्किल है। ब्रिटेन के इंडिपेंडेंट एंटी-स्लेवरी कमिश्नर (IASC) की एक हालिया रिपोर्ट ने ऑनलाइन मानव तस्करी और महिलाओं के यौन शोषण से जुड़े एक गंभीर नेटवर्क का खुलासा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इंटरनेट पर कुछ वेबसाइटों के जरिए महिलाओं और नाबालिग लड़कियों को ऐसे प्रदर्शित किया जा रहा है, जैसे वे कोई सामान्य वस्तु हों और ग्राहक अपनी पसंद के अनुसार उनका चयन कर सकते हों।
63 हजार से ज्यादा ऑनलाइन विज्ञापनों की जांच
IASC कमिश्नर एलेनोर लियोन की जांच में 12 प्रमुख वेबसाइटों पर प्रकाशित करीब 63 हजार विज्ञापनों को खंगाला गया। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इनमें लगभग 60 प्रतिशत विज्ञापनों में मानव तस्करी या यौन शोषण से जुड़े संभावित संकेत पाए गए।
जांच में इन वेबसाइटों की पहुंच का भी अंदाजा लगाया गया। रिपोर्ट के अनुसार, महज एक महीने में इन 12 प्लेटफॉर्म पर चार करोड़ से अधिक विजिट दर्ज किए गए। इससे यह संकेत मिलता है कि ऑनलाइन माध्यम से संचालित यह अवैध कारोबार कितना बड़ा और व्यापक हो चुका है।
महिलाओं को ‘प्रोडक्ट’ की तरह पेश करने का आरोप
रिपोर्ट में पीड़िताओं की स्थिति को बेहद चिंताजनक बताया गया है। पीड़िता मिया डे फाओइट ने कथित तौर पर इन ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को आधुनिक दौर के गुलाम बाजार जैसा बताया। उनके अनुसार, ग्राहकों को महिलाओं के बारे में उम्र और नस्ल जैसी व्यक्तिगत जानकारियों के आधार पर चुनाव करने का अवसर मिलता है।
इस तरह की व्यवस्था में इंसान की गरिमा और स्वतंत्रता को दरकिनार कर उसे महज एक वस्तु की तरह प्रस्तुत किया जाता है। यही वजह है कि मानव तस्करी के खिलाफ काम करने वाली संस्थाएं ऑनलाइन एस्कॉर्ट विज्ञापनों और उनसे जुड़े नेटवर्क की कड़ी निगरानी की मांग कर रही हैं।
पीड़िताओं की आपबीती ने बढ़ाई चिंता
जांच के दौरान सामने आई पीड़ित महिलाओं की कहानियां इस पूरे नेटवर्क की भयावहता को उजागर करती हैं। एक पीड़िता ने बताया कि उसने अपने शरीर पर टैटू इसलिए बनवाया था, ताकि किसी अनहोनी की स्थिति में उसकी पहचान की जा सके।
कुछ पीड़िताओं ने यह भी आरोप लगाया कि जबरन बनाए गए ग्राहकों से मिलने से इनकार करने पर उन्हें गंभीर हिंसा, बलात्कार और हत्या तक की धमकियां दी जाती थीं। यानी इन महिलाओं के पास अपनी इच्छा के मुताबिक फैसले लेने की आजादी तक नहीं रहती।
बिचौलिए करते हैं पूरा नियंत्रण
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कई मामलों में महिलाओं के नाम और तस्वीरों का इस्तेमाल करके ग्राहक से बातचीत कोई और व्यक्ति करता है। कथित बिचौलिए ग्राहकों से संपर्क स्थापित करते हैं, मुलाकात और भुगतान से जुड़ी बातें तय करते हैं और इसके बदले बड़ी रकम अपने पास रखते हैं।
इस व्यवस्था में पीड़ित महिलाओं को आर्थिक लाभ का बहुत कम हिस्सा मिलता है या कई मामलों में उन्हें कुछ भी नहीं दिया जाता। तस्करी और शोषण का यह पूरा तंत्र महिलाओं को आर्थिक, मानसिक और शारीरिक रूप से नियंत्रित रखने पर आधारित होता है।
ब्रिटेन में सख्ती की तैयारी
रिपोर्ट सामने आने के बाद ब्रिटेन में ऑनलाइन मानव तस्करी और शोषण से जुड़े प्लेटफॉर्म पर कार्रवाई को लेकर दबाव बढ़ गया है। सरकार और संबंधित एजेंसियां ऐसे प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी तय करने तथा आपत्तिजनक सामग्री को तेजी से हटाने के लिए सख्त कानूनी व्यवस्था पर जोर दे रही हैं।
प्रस्तावित नियमों के तहत अदालतों को ऐसे प्लेटफॉर्म को निलंबित करने की शक्तियां देने पर चर्चा हो रही है। इसके अलावा टेक कंपनियों को आपत्तिजनक विज्ञापनों और बिना अनुमति साझा की गई तस्वीरों को निर्धारित समय सीमा के भीतर हटाने की जिम्मेदारी देने की बात भी सामने आई है।
बच्चों को इस तरह के अपराधों से बचाने के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उम्र सत्यापन की व्यवस्था को मजबूत करने की मांग भी तेज हो गई है।
कमजोर महिलाओं को बनाया जाता है निशाना
मानव तस्करी के खिलाफ काम करने वाली संस्थाओं के अनुसार, अपराधी अक्सर आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर महिलाओं को अपना निशाना बनाते हैं। नौकरी, आर्थिक मदद या बेहतर जिंदगी का झांसा देकर उन्हें ऐसे नेटवर्क में फंसाया जा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इंटरनेट पर मौजूद हर एस्कॉर्ट सर्विस या मसाज सर्विस का विज्ञापन अपराध से जुड़ा हो, यह जरूरी नहीं है। लेकिन संदिग्ध विज्ञापनों, असामान्य परिस्थितियों और जबरदस्ती के संकेतों को नजरअंदाज भी नहीं किया जाना चाहिए।
IASC की रिपोर्ट ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि डिजिटल दुनिया में तकनीकी कंपनियों, सरकारों और कानून लागू करने वाली एजेंसियों की जिम्मेदारी कितनी बड़ी है। इंटरनेट की पहुंच लगातार बढ़ रही है, ऐसे में ऑनलाइन मानव तस्करी और यौन शोषण के नेटवर्क पर लगाम लगाने के लिए सख्त कानून, बेहतर निगरानी और पीड़ितों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना बेहद जरूरी हो गया है।

