बिलासपुर। किसानों को प्राकृतिक आपदाओं और फसल नुकसान से आर्थिक सुरक्षा देने के उद्देश्य से लागू फसल बीमा योजना को लेकर छत्तीसगढ़ में गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, योजना को ऐच्छिक बताया गया है, लेकिन सहकारी समितियों से कृषि ऋण लेने वाले किसानों के खातों से उनकी स्पष्ट सहमति के बिना भी फसल बीमा का प्रीमियम काटे जाने की शिकायतें सामने आई हैं। वहीं, बीमा कंपनियों को पिछले छह वर्षों में किसानों से हजारों करोड़ रुपये का प्रीमियम मिला, जबकि इसके मुकाबले क्लेम की राशि काफी कम रही।
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020 से 2025 के बीच छत्तीसगढ़ में फसल बीमा कंपनियों को करीब 7,897.14 करोड़ रुपये का प्रीमियम मिला। इसमें किसानों के साथ केंद्र और राज्य सरकार का अंशदान भी शामिल है। इसी अवधि में किसानों को करीब 2,394.54 करोड़ रुपये के क्लेम का भुगतान किया गया। यानी प्रीमियम और क्लेम के बीच लगभग 5,502.6 करोड़ रुपये का अंतर रहा।
लिखित सहमति के बिना प्रीमियम काटने का आरोप
फसल बीमा किसानों के लिए ऐच्छिक योजना है, लेकिन रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि सहकारी समितियों से कृषि ऋण लेने वाले किसानों के खातों से कई मामलों में प्रीमियम स्वत: काट लिया जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, कटौती से पहले किसानों से सहमति लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं।
बीमा नहीं चाहने वाले किसान को अंतिम तारीख से कम से कम सात दिन पहले बैंक या समिति में लिखित आवेदन देना पड़ता है। यदि किसान ऐसा आवेदन नहीं देता तो उसे योजना में शामिल मानकर उसके खाते से प्रीमियम काट लिया जाता है।
यानी व्यवहार में किसान के लिए योजना से बाहर रहने के लिए भी एक अलग प्रक्रिया पूरी करना जरूरी हो जाती है। यही व्यवस्था किसानों के बीच नाराजगी का कारण बन रही है।
सहकारी समितियों पर निर्भरता बनी वजह
रिपोर्ट में बताया गया है कि किसानों को सहकारी समितियों के माध्यम से प्रति एकड़ करीब 16 हजार से 20 हजार रुपये तक नकद तथा खाद-बीज के रूप में ऋण मिलता है। साथ ही समितियों को फसल बीमा का लक्ष्य भी दिया जाता है।
ऐसे में समितियों पर किसानों के ऋण और बीमा दोनों से जुड़े काम होने के कारण उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि समितियों को दिए गए लक्ष्यों और किसानों की ऋण जरूरतों के बीच व्यवस्था ऐसी बन गई है कि किसान प्रीमियम कटौती का विरोध करने की स्थिति में नहीं रह पाते।
धान की फसल पर कितना प्रीमियम?
रिपोर्ट के अनुसार सिंचित धान के लिए किसान के खाते से प्रति हेक्टेयर 534 रुपये, जबकि असिंचित धान के लिए 383 रुपये प्रीमियम जमा होता है। इसमें केंद्र और राज्य सरकार का अंशदान जुड़ने के बाद बीमा कंपनी को क्रमशः 1,320 रुपये और 946 रुपये प्रति हेक्टेयर मिलते हैं।
वहीं, रिपोर्ट में सिंचित धान के लिए करीब 66 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर और असिंचित धान के लिए करीब 47,300 रुपये प्रति हेक्टेयर का बीमा कवर बताया गया है।
छह साल में 7,897 करोड़ का प्रीमियम
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 से 2025 के बीच बीमा कंपनियों के पास कुल 3,45,84,408 आवेदन पहुंचे। इन छह वर्षों में कुल प्रीमियम करीब 7,897.14 करोड़ रुपये रहा, जबकि क्लेम की कुल राशि करीब 2,394.54 करोड़ रुपये दर्ज की गई।
वर्षवार आंकड़ों के मुताबिक:
- 2020: प्रीमियम 1,220 करोड़ रुपये, क्लेम 616.46 करोड़ रुपये
- 2021: प्रीमियम 1,198.94 करोड़ रुपये, क्लेम 992.83 करोड़ रुपये
- 2022: प्रीमियम 1,315.66 करोड़ रुपये, क्लेम 236.74 करोड़ रुपये
- 2023: प्रीमियम 1,354.65 करोड़ रुपये, क्लेम 191.58 करोड़ रुपये
- 2024: प्रीमियम 1,393.26 करोड़ रुपये, क्लेम 119.02 करोड़ रुपये
- 2025: प्रीमियम 1,414.60 करोड़ रुपये, क्लेम 237.91 करोड़ रुपये
इन आंकड़ों से साफ है कि छह साल की अवधि में जमा प्रीमियम और किसानों को मिले क्लेम के बीच बड़ा अंतर रहा है।
तीन कंपनियों के पास बीमा की जिम्मेदारी
रिपोर्ट में बताया गया है कि छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों में फसल बीमा का काम तीन कंपनियों के पास रहा। इनमें एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड (AIC), बजाज आलियांज जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड सहित अन्य बीमा कंपनी शामिल हैं।
एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड को दुर्ग, बेमेतरा, बालोद, धमतरी, कांकेर, कोंडागांव, कोरबा, जांजगीर-चांपा, मुंगेली, बिलासपुर और रायगढ़ समेत कई जिलों की जिम्मेदारी मिली। वहीं बजाज आलियांज जनरल इंश्योरेंस को रायपुर, बस्तर, बीजापुर, दंतेवाड़ा, जशपुर, कबीरधाम, सरगुजा, सूरजपुर, बलरामपुर और गरियाबंद समेत अन्य जिलों में बीमा का काम दिया गया।
ऋणी और अऋणी किसानों का आंकड़ा अलग
फसल बीमा पोर्टल पर ऋणी और अऋणी किसानों के आवेदनों की संख्या अलग-अलग दिखाई जाती है। लेकिन रिपोर्ट में सवाल उठाया गया है कि केवल प्रीमियम और क्लेम के वित्तीय आंकड़े सामने आने से यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि अपनी इच्छा से बीमा कराने वाले अऋणी किसानों को कितना क्लेम मिला और बैंकों या समितियों के माध्यम से जुड़े ऋणी किसानों को कितना भुगतान किया गया।
इससे किसानों के लिए बीमा योजना की वास्तविक उपयोगिता और भुगतान व्यवस्था को समझना मुश्किल हो जाता है।
किसानों को नियमों की पूरी जानकारी नहीं
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कई किसानों को फसल बीमा से जुड़े नियमों और प्रीमियम कटौती की प्रक्रिया की पर्याप्त जानकारी नहीं है। यदि किसान को पहले से पता ही नहीं है कि उसके खाते से प्रीमियम काटा जाएगा, तो वह समय रहते योजना से बाहर रहने के लिए आवेदन भी नहीं कर पाता।
यही वजह है कि किसानों की ओर से पारदर्शिता बढ़ाने और बीमा प्रक्रिया की जानकारी सीधे किसानों तक पहुंचाने की मांग उठती रही है।
सरकार और बीमा कंपनियों से पारदर्शिता की मांग
फसल बीमा योजना का मूल उद्देश्य किसानों को प्राकृतिक आपदा, सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि और अन्य कारणों से होने वाले फसल नुकसान से आर्थिक सुरक्षा देना है। लेकिन यदि किसान को अपनी इच्छा के विरुद्ध प्रीमियम कटने की शिकायत हो और क्लेम भुगतान की प्रक्रिया भी पूरी तरह स्पष्ट न हो, तो योजना की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब जरूरत है कि सरकार और संबंधित विभाग इस पूरी व्यवस्था की समीक्षा करें। किसानों से प्रीमियम काटने से पहले उनकी सहमति की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए, उन्हें बीमा की शर्तों और प्रीमियम की पूरी जानकारी दी जाए तथा क्लेम भुगतान से संबंधित जिलेवार और श्रेणीवार आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं।
किसानों के लिए यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उनके खाते से कितना प्रीमियम काटा गया, उसमें किसान का कितना हिस्सा है, सरकार का कितना अंशदान है और नुकसान होने की स्थिति में उन्हें कितनी राशि का क्लेम मिला। तभी फसल बीमा योजना वास्तव में किसानों के लिए सुरक्षा कवच बन सकेगी।

