ED ने पुलिस FIR का हवाला देते हुए कहा कि VGP ग्रुप की कंपनियों ने 1991 में सड़कों और पार्कों के लिए जो ज़मीनें दी थीं, उन्हें बाद में “फर्जी और बनावटी” डॉक्यूमेंट्स के ज़रिए वापस ले लिया गया और फिर NHAI और स्टेट इंडस्ट्रीज प्रमोशन कॉर्पोरेशन ऑफ़ तमिलनाडु (SIPCOT) द्वारा अधिग्रहण से कुछ समय पहले प्राइवेट लोगों को बेच दिया गया. फेडरल एजेंसी ने एक बयान में कहा कि छापेमारी के दौरान 18.10 करोड़ रुपये की संपत्ति भी ज़ब्त की गई. पीटीआई के मुताबिक, ईडी के बयान में कहा गया है कि ED के चेन्नई ज़ोनल ऑफिस ने 2021 और 2022 में श्रीपेरंबदूर और कांचीपुरम में पुलिस द्वारा जालसाजी, धोखाधड़ी, आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी से मुआवज़ा लेने के मामले में दर्ज FIR के आधार पर जांच शुरू की.
मीडिया के मुताबिक, मद्रास हाई कोर्ट ने इन मामलों से जुड़ी कार्रवाई में यह भी देखा था कि कई लोगों ने अधिग्रहण से पहले धोखे से ज़मीनों पर मालिकाना हक का दावा किया था, जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ. ED की जांच में पाया गया कि NHAI और SIPCOT द्वारा अधिग्रहण से ठीक पहले सरकारी अधिकारियों के पक्ष में रजिस्टर किए गए डीड को कैंसिल करने के लिए जाली, फर्जी, बोगस डॉक्यूमेंट्स का इस्तेमाल किया गया था. इन कथित धोखाधड़ी वाले कैंसिलेशन से उन ज़मीनों की बिक्री हो गई जो असल में सरकारी कामों के लिए थीं.
ईडी ने कहा कि बदमाश यहीं नहीं रुके और धोखे से हासिल की गई ज़मीनों को अपने ही साथियों को बेच दिया. निदेशालय की तरफ से कहा गया है कि खरीदारों (बेचने वालों के साथी) ने ज़्यादा मुआवज़े का दावा करने के लिए ज़्यादा खरीद कीमत दिखाई. इन बढ़ा-चढ़ाकर की गई वैल्यूएशन के आधार पर, खरीदारों ने कथित तौर पर NHAI द्वारा बैंगलोर-चेन्नई एक्सप्रेसवे और SIPCOT द्वारा इंडस्ट्रियल विस्तार के लिए अधिग्रहण के दौरान बहुत ज़्यादा मुआवज़ा हासिल किया. ED की जांच में आगे पता चला कि खास लोगों और उनसे जुड़े सरकारी कर्मचारियों ने एक सुनियोजित तरीका बनाया था. एजेंसी ने कहा कि इस स्कीम में गैर-कानूनी तरीके से डीड कैंसिल करना, कंट्रोल्ड और डमी खरीदारों के ज़रिए पब्लिक यूटिलिटी ज़मीनों को दोबारा बेचना, रजिस्ट्रेशन डॉक्यूमेंट्स में मार्केट वैल्यू को बनावटी तरीके से बढ़ाना और सरकारी अधिग्रहण अधिकारियों से ज़्यादा मुआवज़ा लेना शामिल था. ईडी ने अपने बयान में कहा, ‘मुआवज़ा मिलने के बाद, पैसे को खास लोगों से जुड़े सहयोगियों, रिश्तेदारों और शेल कंपनियों के कई बैंक अकाउंट्स के ज़रिए निकाला गया. कई मामलों में जुर्म की कमाई को लेयर में डालने के बाद कई करोड़ रुपये की बड़ी कैश निकासी पाई गई ताकि फंड का सोर्स छिपाया जा सके.’

