नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय नौसेना की जज एडवोकेट जनरल यानी जेएजी शाखा की महिला अधिकारी सीमा चौधरी को स्थायी कमीशन देने से इनकार करने वाला चयन बोर्ड का फैसला रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने नौसेना को उनके दावे पर छह सप्ताह के भीतर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया। अदालत ने पाया कि चयन बोर्ड ने अधिकारी की अनुकूल वार्षिक गोपनीय रिपोर्टों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया और पिछली गैर-सिफारिशों को जरूरत से ज्यादा अहमियत दी। अदालत ने नौसेना चयन बोर्ड के 12 अप्रैल, 2024 के निर्णय को खारिज किया। इस निर्णय में सीमा चौधरी का स्थायी कमीशन का दावा अस्वीकार किया गया था। अब बोर्ड को दोबारा बैठक कर अदालत के निर्देशों के अनुरूप उनका मूल्यांकन करना होगा। यह आदेश सीधे स्थायी कमीशन प्रदान करने का नहीं, बल्कि पहले निर्णय की खामियां दूर कर पुनर्विचार करने का है।
अच्छे प्रदर्शन को पर्याप्त महत्व नहीं मिला
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने अधिकारी की वार्षिक गोपनीय रिपोर्टों पर विचार किया। पीठ के अनुसार, इन रिपोर्टों में उनके प्रदर्शन का समग्र मूल्यांकन अच्छा था। इसके बावजूद चयन बोर्ड ने वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा पहले स्थायी कमीशन की सिफारिश नहीं किए जाने को उनकी उपयुक्तता तय करने में महत्वपूर्ण आधार बना लिया अदालत ने गौर किया कि सीमा चौधरी ने अपनी अधिकांश गोपनीय रिपोर्टों में पदोन्नति के लिए आवश्यक ग्रेडिंग हासिल की थी। पीठ ने सवाल उठाया कि पदोन्नति के निर्धारित मानकों को पूरा करने वाली अधिकारी को स्थायी कमीशन के लिए अनुपयुक्त मानते समय उनके अच्छे प्रदर्शन को पर्याप्त महत्व क्यों नहीं दिया गया।
इस तरह अदालत की आपत्ति मूल्यांकन के तरीके पर थी। अधिकारी की रिपोर्टों में दर्ज प्रदर्शन और स्थायी कमीशन के बारे में की गई सिफारिशों को साथ पढ़ना जरूरी था। पीठ ने माना कि सकारात्मक समग्र मूल्यांकन के बावजूद पुरानी गैर-सिफारिशों पर अधिक निर्भर रहने से निर्णय प्रभावित हुआ।
खाली कॉलम अधिकारी के खिलाफ नहीं जाएंगे
सुनवाई में यह भी सामने आया कि सीमा चौधरी को वर्ष 2013 और 2014 में स्थायी कमीशन के लिए सिफारिशें मिली थीं। वहीं, वर्ष 2008 से 2012 की रिपोर्टों में इससे संबंधित कॉलम खाली छोड़े गए थे। अदालत ने माना कि किसी कॉलम में टिप्पणी दर्ज नहीं होने को अधिकारी के विरुद्ध इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। पीठ ने निर्देश दिया कि 14 जुलाई, 2008 से 31 अक्टूबर, 2014 की अवधि की संबंधित गोपनीय रिपोर्टों को स्थायी कमीशन के लिए सकारात्मक सिफारिश वाला माना जाए। यह निर्देश दोबारा होने वाले मूल्यांकन के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि बोर्ड को अब इन रिपोर्टों पर अदालत द्वारा स्पष्ट की गई स्थिति के अनुसार विचार करना होगा।
पहले भी स्वतंत्र मूल्यांकन का दिया गया था निर्देश
सीमा चौधरी वर्ष 2007 बैच की शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारी हैं। उनका स्थायी कमीशन का मामला पहले भी न्यायिक कार्यवाही का विषय रहा है। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, नए आदेश के बाद नौसेना उनके दावे का चौथी बार मूल्यांकन करेगी। वह उन महिला अधिकारियों में शामिल थीं, जिनकी याचिकाओं की पृष्ठभूमि में वर्ष 2020 का महत्वपूर्ण फैसला आया था। पूर्व कार्यवाही में उनके मामले को स्वतंत्र आधार पर देखने का निर्देश दिया गया था। इसका उद्देश्य यह था कि नया मूल्यांकन पहले के निष्कर्षों या टिप्पणियों से प्रभावित न हो। महिला अधिकारी की ओर से आपत्ति थी कि पुनर्विचार के दौरान भी पिछली गैर-सिफारिशों पर भरोसा किया गया, जिससे स्वतंत्र मूल्यांकन के निर्देश का उचित पालन नहीं हुआ।
नौसेना ने अपने मूल्यांकन का किया बचाव
नौसेना की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने तर्क दिया कि अधिकारी के मामले पर स्वतंत्र रूप से विचार किया गया था। उन्होंने कहा कि अलग-अलग वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा किए गए मूल्यांकन और स्थायी कमीशन की सिफारिश नहीं किए जाने के रिकॉर्ड को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। नौसेना का पक्ष यह भी था कि अच्छे प्रदर्शन के कारण शॉर्ट सर्विस कमीशन की सेवा अवधि बढ़ाए जाने से स्थायी कमीशन अपने आप नहीं मिल जाता। हालांकि, अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड देखने के बाद बोर्ड के आकलन में खामियां पाईं और नया निर्णय लेने का निर्देश दिया।
अब छह सप्ताह में करना होगा पुनर्विचार
सुप्रीम कोर्ट ने चयन बोर्ड को फिर बैठक बुलाकर सीमा चौधरी के दावे पर निर्धारित समय में विचार करने को कहा है। बोर्ड को उनके अनुकूल प्रदर्शन, पदोन्नति संबंधी ग्रेडिंग और संबंधित अवधि की रिपोर्टों के बारे में दिए गए निर्देशों को ध्यान में रखना होगा। इस फैसले से सीमा चौधरी को अपने सेवा रिकॉर्ड के उचित मूल्यांकन का नया अवसर मिला है। स्थायी कमीशन पर अंतिम निर्णय पुनर्विचार की प्रक्रिया के बाद होगा। अदालत का आदेश स्पष्ट करता है कि चयन बोर्ड अधिकारी के पूरे प्रासंगिक मूल्यांकन को पर्याप्त महत्व दे और पुरानी गैर-सिफारिशों को अच्छे प्रदर्शन पर हावी होने का आधार न बनाए।

