सरगुजा। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के उदयपुर क्षेत्र में एक और जंगली हाथी की करंट की चपेट में आने से मौत की सूचना सामने आई है। घटना ने एक बार फिर हसदेव-अरण्य क्षेत्र में बढ़ते मानव-हाथी संघर्ष और वन्यजीवों के आवास पर मंडराते खतरे को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, इस ताजा मौत की विस्तृत आधिकारिक जानकारी और पोस्टमार्टम रिपोर्ट अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, इसलिए मौत की परिस्थितियों की अंतिम पुष्टि वन विभाग की जांच के बाद ही होगी।
उदयपुर वन परिक्षेत्र लंबे समय से हाथियों की आवाजाही वाला क्षेत्र रहा है। अगस्त 2026 में भी एक दंतैल हाथी उदयपुर के पीईकेबी कोयला खदान क्षेत्र में प्रवेश कर गया था। वन विभाग की टीम ने करीब दो घंटे की मशक्कत के बाद उसे सुरक्षित खदान क्षेत्र से बाहर निकाला था।
छत्तीसगढ़ के सरगुजा के उदयपुर इलाके में करंट से एक और हाथी की मौत हो गई.
भारत सरकार के WII ने हसदेव में एक भी नया कोयला खदान खोलने पर मानव-हाथी संघर्ष के भयावह होने की चेतावनी दी थी.
अब तो भारत सरकार ने कोयला खोद कर बेचने के लिए हसदेव के खदान की नीलामी शुरू कर दी है. pic.twitter.com/6hGrcNpYIe
— Alok Putul (@thealokputul) October 1, 2026
इस घटना ने यह सवाल फिर खड़ा किया है कि जिन इलाकों में हाथियों की प्राकृतिक आवाजाही लगातार बनी हुई है, वहां खनन और अन्य मानव गतिविधियों का विस्तार वन्यजीवों के लिए कितना जोखिम बढ़ा सकता है।
WII की रिपोर्ट में पहले ही दी गई थी चेतावनी
हसदेव-अरण्य को लेकर Wildlife Institute of India (WII), Dehradun ने 2021 में विस्तृत जैव-विविधता आकलन किया था। यह अध्ययन राज्य सरकार द्वारा ICFRE के माध्यम से WII के सहयोग से कराया गया था।
WII की रिपोर्ट के अनुसार हसदेव-अरण्य कोयला क्षेत्र और आसपास का परिदृश्य बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र से घिरा है। अध्ययन में 2018 से 2020 के दौरान वन विभाग के रिकॉर्ड के आधार पर हाथियों की मौजूदगी 647 में से 148 वन कक्षों में दर्ज की गई थी। रिपोर्ट ने अनुमान लगाया था कि अलग-अलग समय में करीब 40 से 50 हाथी इस परिदृश्य के विभिन्न हिस्सों का उपयोग कर सकते हैं।
रिपोर्ट में यह भी दर्ज किया गया कि छत्तीसगढ़ में मानव-हाथी संघर्ष पहले से गंभीर स्थिति में है। WII के आकलन के मुताबिक राज्य में हाथियों की संख्या अपेक्षाकृत कम होने के बावजूद मानव-हाथी संघर्ष से होने वाली जनहानि का स्तर काफी अधिक रहा है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि WII ने हसदेव-अरण्य के लिए स्पष्ट रूप से कहा था कि प्राकृतिक आवास की अखंडता बनाए रखना और उसके विखंडन को रोकना बेहद महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई कि अतिरिक्त खनन से होने वाला आवास नुकसान मानव-हाथी संघर्ष को “अप्रत्याशित रूप से बहुत अधिक” बढ़ा सकता है।
WII ने क्यों जताई थी चिंता?
हाथियों का क्षेत्र काफी बड़ा होता है और वे भोजन, पानी तथा सुरक्षित आवास की तलाश में एक जंगल से दूसरे जंगल तक आवाजाही करते हैं। ऐसे में सड़क, खदान, बिजली लाइन, बस्तियां और अन्य मानव गतिविधियां उनके पारंपरिक रास्तों को प्रभावित कर सकती हैं।
WII के अध्ययन में हसदेव-अरण्य और आसपास के क्षेत्र में हाथियों की मौजूदगी को किसी एक छोटे इलाके तक सीमित नहीं पाया गया था। हाथियों का उपयोग पूरे लैंडस्केप में फैला हुआ बताया गया था।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि हाथियों के बड़े आवास क्षेत्र और पहले से खंडित जंगलों के कारण संरक्षण की रणनीति केवल किसी एक खदान या एक गांव तक सीमित नहीं रखी जा सकती। इसके लिए पूरे लैंडस्केप स्तर पर योजना जरूरी है।
अब तारा कोल ब्लॉक की नीलामी पर फिर बहस
हसदेव-अरण्य को लेकर विवाद सितंबर 2026 में उस समय फिर तेज हुआ जब तारा (संशोधित) कोयला ब्लॉक की प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी पूरी हुई।
छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम (CMDC) के मुताबिक नीलामी में नौ बोलियां मिली थीं और प्रक्रिया पूरी होने के बाद ब्लॉक सीजी सिन एंड गैस एंड केमिकल्स लिमिटेड को मिला। हालांकि CMDC ने स्पष्ट किया कि नीलामी पूरी होने का अर्थ तत्काल खनन शुरू होना नहीं है। खनन से पहले जरूरी वैधानिक मंजूरियां हासिल करनी होंगी।
केंद्र सरकार के कोयला मंत्रालय ने भी 11 सितंबर 2026 को तारा ब्लॉक को लेकर स्पष्टीकरण जारी किया। मंत्रालय के अनुसार 2023 में तारा ब्लॉक को नीलामी से हटा दिया गया था, क्योंकि छत्तीसगढ़ सरकार ने हसदेव-अरण्य के कोयला ब्लॉकों को नीलामी से बाहर रखने का अनुरोध किया था।
बाद में 11 दिसंबर 2025 को छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से तारा कोल ब्लॉक को शामिल करने का पत्र मिला। केंद्र के अनुसार इस पत्र में कहा गया था कि तारा ब्लॉक लेमरू हाथी कॉरिडोर के बाहर है और इसे अगली नीलामी में शामिल किया जा सकता है। इसके बाद कॉरिडोर के प्रभाव वाले क्षेत्र को हटाकर संशोधित ब्लॉक को 15वें दौर की वाणिज्यिक कोयला खदान नीलामी में रखा गया और उसकी नीलामी हुई।
नीलामी और खनन में अंतर समझना जरूरी
इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि कोयला ब्लॉक की नीलामी हो जाना और जमीन पर खनन शुरू हो जाना एक ही बात नहीं है।
CMDC के अनुसार तारा ब्लॉक में वास्तविक खनन शुरू करने से पहले वन, पर्यावरण और अन्य जरूरी वैधानिक अनुमतियां प्राप्त करनी होंगी।
यानी फिलहाल नीलामी पूरी हो चुकी है, लेकिन उससे यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि उसी के साथ तत्काल बड़े पैमाने पर खनन शुरू हो गया है।
दूसरी तरफ खदान में पहुंच रहे हाथी
उदयपुर क्षेत्र में हाथियों की मौजूदगी का एक हालिया उदाहरण अगस्त में भी सामने आया था। एक दंतैल हाथी पीईकेबी खदान के भीतर पहुंच गया था। खदान क्षेत्र में कंटीले तारों के बीच हाथी के पहुंचने से कर्मचारियों में हड़कंप मच गया था। वन विभाग ने करीब दो घंटे की कार्रवाई के बाद उसे सुरक्षित बाहर निकाला।
यह घटना यह दिखाती है कि खनन क्षेत्र और हाथियों की आवाजाही वाला प्राकृतिक परिदृश्य कई जगह एक-दूसरे के बेहद करीब आ चुके हैं।
करंट भी बना हाथियों के लिए बड़ा खतरा
छत्तीसगढ़ के दूसरे इलाकों में भी बिजली के करंट से हाथियों की मौत के मामले सामने आए हैं। सितंबर 2026 में जशपुर के दुलदुला वन परिक्षेत्र में शिकार के लिए कथित तौर पर बिछाए गए करीब 1.5 किलोमीटर लंबे बिजली के तार की चपेट में आने से एक नर हाथी की मौत हुई थी। वन विभाग ने इस मामले में छह आरोपियों को गिरफ्तार किया था और अन्य संदिग्धों की तलाश की जा रही थी।
इस घटना में वन विभाग ने पोस्टमार्टम के बाद फोरेंसिक नमूने भी सुरक्षित किए थे और बिजली आपूर्ति से जुड़े रिकॉर्ड मांगे थे। इससे स्पष्ट है कि बिजली का असुरक्षित इस्तेमाल हाथियों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
सवाल अब सिर्फ एक हाथी की मौत का नहीं
उदयपुर में सामने आई ताजा मौत की सूचना की आधिकारिक जांच का इंतजार है, लेकिन हसदेव क्षेत्र में हाथियों की लगातार मौजूदगी, खदान क्षेत्रों में उनका प्रवेश और WII की पुरानी चेतावनी को एक साथ देखा जाए तो मामला केवल एक घटना तक सीमित नहीं रह जाता।
WII की रिपोर्ट ने पहले ही कहा था कि हसदेव-अरण्य में अतिरिक्त खनन से प्राकृतिक आवास के नुकसान और विखंडन के कारण मानव-हाथी संघर्ष बढ़ सकता है।
अब तारा ब्लॉक की नीलामी पूरी हो चुकी है। केंद्र सरकार का कहना है कि लेमरू हाथी कॉरिडोर के प्रभाव वाले हिस्से को हटाकर ही संशोधित ब्लॉक को नीलामी में शामिल किया गया है। दूसरी ओर, पर्यावरण और हसदेव संरक्षण से जुड़े समूह इस फैसले पर आपत्ति जता रहे हैं और क्षेत्र की जैव-विविधता तथा मानव-हाथी संघर्ष को लेकर चिंता व्यक्त कर रहे हैं।
ऐसे में आने वाले समय में सबसे अहम सवाल यह होगा कि नई परियोजनाओं की वैधानिक मंजूरियों के दौरान हाथियों के आवास, उनके आवागमन के रास्तों और मानव-हाथी संघर्ष के जोखिम का आकलन किस तरह किया जाता है।

