गरियाबंद। उदंती सीतानदी टाइगर रिज़र्व में अब जंगल के दुर्लभ वन्यप्राणी ही ग्रामीणों के जीवन में बदलाव की नई कहानी लिखेंगे। वन विभाग ने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर “गुडविल एम्बेसडर” कार्यक्रम की शुरुआत की है, जिसका उद्देश्य ईको-टूरिज्म को बढ़ावा देना और ग्रामीणों के पलायन को रोकना है।
पिछले तीन वर्षों में संयुक्त संरक्षण प्रयासों के चलते रिज़र्व क्षेत्र में भारतीय उड़न गिलहरी, भारतीय विशाल गिलहरी, मालाबार पाइड हॉर्नबिल और शाहीन फाल्कन जैसे दुर्लभ वन्यजीवों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इन अनोखे जीवों को देखने अब दूर-दूर से पर्यटक यहां पहुंच रहे हैं।
इसी बढ़ते आकर्षण को देखते हुए वन विभाग ने ग्रामीणों को पर्यटन से जोड़ने की पहल की है। इसके तहत गांवों के प्रमुख व्यक्तियों को “गुडविल एम्बेसडर” बनाया जा रहा है, जो फील्ड स्टाफ के साथ मिलकर ग्रामीणों को जागरूक करेंगे और युवाओं को नेचर गाइड व सफारी गाइड बनने के लिए प्रेरित करेंगे।
योजना के तहत गाइड्स का पंजीकरण टाइगर रिज़र्व की वेबसाइट पर किया जाएगा, जिससे पर्यटक ऑनलाइन ही सफारी और गाइड बुक कर सकेंगे। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और दक्षिण भारत की ओर पलायन करने वाले ग्रामीणों की संख्या में कमी आएगी।
गांवों को मिली नई पहचान
इस पहल के तहत अलग-अलग गांवों को वहां पाए जाने वाले विशेष वन्यजीवों के नाम से नई पहचान दी जा रही है—
•कुल्हाड़ीघाट को “उड़न गिलहरी ग्राम” के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहां कायाकिंग और जिप्सी सफारी की सुविधा उपलब्ध होगी।
•ओढ़ में “हार्नबिल ग्राम” के तहत ट्रैकिंग, कायाकिंग और टेंट हाउस की सुविधा शुरू की गई है।
•साहेबिनकछार और नागेश को “वन-भैंसा ग्राम” के रूप में विकसित कर जिप्सी सफारी शुरू की गई है।
•कोयबा और सिंघनपुर में “भारतीय विशाल गिलहरी ग्राम” के रूप में कॉटेज और सफारी सुविधाएं विकसित की जा रही हैं।
•बुड्गेलटप्पा को “शाहीन बाज़ एवं हार्नबिल ग्राम” और भीरागांव को “बाघ ग्राम” के रूप में पहचान दी गई है।
वन विभाग का मानना है कि इस अनोखी पहल से न केवल जंगल और वन्यजीवों का संरक्षण मजबूत होगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा मिलेगी। अब जंगल के ये दुर्लभ मेहमान ही ग्रामीणों के लिए रोजगार और समृद्धि का नया रास्ता खोलेंगे।

