धमतरी। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व (USTR) के करका क्षेत्र में वन भूमि पर अतिक्रमण और जंगलों की कटाई का मामला सामने आया है। वन विभाग के प्रारंभिक आकलन के अनुसार वर्ष 2016 से 2026 के बीच इस क्षेत्र में करीब 30 हजार पेड़-पौधे काटे जाने का अनुमान है। वहीं वर्तमान GPS आधारित आकलन में अतिक्रमित क्षेत्र करीब 35 हेक्टेयर तक पाया गया है। हालांकि अतिक्रमण की अंतिम सीमा DGPS ड्रोन मैपिंग पूरी होने के बाद तय की जाएगी।
USTR के अनुसार करका क्षेत्र महत्वपूर्ण वन परिदृश्य और वन्यजीवों के आवागमन वाले क्षेत्र का हिस्सा है। यह हाथियों के आवागमन के लिए भी महत्वपूर्ण माना गया है। वन आवास के लगातार क्षरण से भविष्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति बढ़ने की आशंका जताई गई है।
मुआवजा मिलने के बाद भी दोबारा अतिक्रमण का आरोप
विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार करका पहले एक वन ग्राम था, जो सोंढूर बांध के कैचमेंट क्षेत्र में तत्कालीन सीतानदी अभयारण्य के अंतर्गत स्थित था। सोंढूर बांध के निर्माण के बाद 1980 के दशक में गांव का विस्थापन किया गया था। उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक करका गांव के 55 लोगों को जल संसाधन विभाग की ओर से मुआवजा दिया गया था। इसके बावजूद बाद में वन भूमि पर दोबारा अतिक्रमण और जंगल कटाई की गतिविधियां सामने आईं।
2016 में भी दर्ज हुआ था वन अपराध का मामला
करका क्षेत्र में अतिक्रमण को लेकर पहले भी कार्रवाई हो चुकी है। वर्ष 2016 में POR क्रमांक 7922 के तहत करका गांव से जुड़े 22 लोगों के खिलाफ करीब 22 हेक्टेयर घने वन क्षेत्र में कथित अतिक्रमण को लेकर मामला दर्ज किया गया था। बाद में वर्ष 2023 में नगरी न्यायालय ने आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। वन विभाग के अनुसार इसके बावजूद क्षेत्र के कुछ हिस्सों में अतिक्रमण जारी रहा और बाद में इसका विस्तार भी हुआ।
निरीक्षण में 1100 से ज्यादा पेड़ों पर गडलिंग और ताजा ठूंठ मिले
22 सितंबर 2026 को किए गए मैदानी निरीक्षण के दौरान वन विभाग की टीम को जंगल में बड़े पैमाने पर वन क्षरण के प्रमाण मिले। विभाग के अनुसार 1,100 से अधिक पेड़ों पर गडलिंग और बड़ी संख्या में ताजा कटे पेड़ों के ठूंठ पाए गए।
अतिक्रमित क्षेत्र की GPS आधारित मैपिंग जारी है। इसके साथ ही DGPS आधारित ड्रोन मैपिंग के जरिए अतिक्रमण की वास्तविक सीमा और वन विनाश की स्थिति को वैज्ञानिक एवं सत्यापन योग्य डिजिटल साक्ष्यों के रूप में दर्ज किया जा रहा है।
ISRO की सैटेलाइट तस्वीरों से भी वन क्षरण के संकेत
USTR ने क्षेत्र की ऐतिहासिक वन स्थिति का आकलन करने के लिए ISRO की सैटेलाइट इमेजरी का अध्ययन भी किया है। विभाग के अनुसार वर्ष 2006 और 2012 की तस्वीरों में क्षेत्र में घना वन दिखाई देता है। इसके बाद करीब 2017 से वन क्षेत्र के धीरे-धीरे खुले वन क्षेत्र में बदलने के संकेत मिले हैं और बाद की सैटेलाइट तस्वीरों में भी वन क्षरण जारी दिखाई देता है।
मैदानी सत्यापन और वन आवरण में बदलाव के आधार पर वन विभाग का प्रारंभिक अनुमान है कि वर्ष 2016 से 2026 के बीच करीब 30 हजार पेड़-पौधे हटाए गए।
विभाग इस मामले में GPS/DGPS कोऑर्डिनेट्स, ड्रोन इमेजरी, सैटेलाइट इमेजरी, मैदानी तस्वीरें, स्वतंत्र गवाहों के बयान और अन्य डिजिटल साक्ष्य जुटा रहा है। इनका इस्तेमाल जांच और आवश्यकता पड़ने पर न्यायालयीन कार्रवाई में किया जा सकता है।
वन विभाग की टीम को निरीक्षण के दौरान रोकने का आरोप
22 सितंबर को USTR के उप संचालक के नेतृत्व में करीब 20 से 25 वन अधिकारियों और कर्मचारियों की टीम अतिक्रमित क्षेत्र का निरीक्षण कर रही थी। टीम में महिला वन अधिकारी और कर्मचारी भी शामिल थीं।
विभागीय प्रारंभिक जानकारी के अनुसार निरीक्षण के दौरान करका निवासी मुकेश मरकाम से कथित अतिक्रमित वन भूमि पर की जा रही कृषि गतिविधियों को लेकर पूछताछ की गई। विभाग का कहना है कि पूछताछ में उसने कथित तौर पर अतिक्रमित क्षेत्र में अवैध रूप से उगाई जा रही फसलों की रखवाली करने की बात बताई।
वन विभाग के अनुसार जब टीम कथित अतिक्रमित भूमि की ओर आगे बढ़ी तो करका गांव के करीब 50 से 60 लोगों ने सरकारी कर्मचारियों को उनके शासकीय कर्तव्यों के निर्वहन से कथित रूप से रोका और मुकेश मरकाम को मौके से ले गए। घटना की वीडियो रिकॉर्डिंग भी वन विभाग की टीम द्वारा की गई है।
मुकेश मरकाम समेत अन्य के खिलाफ नया POR दर्ज
वन विभाग के अनुसार घटना के बाद पुलिस में FIR दर्ज कराने के लिए वीडियो साक्ष्य के साथ लिखित आवेदन दिया जा रहा है। वहीं उप संचालक USTR के हस्तक्षेप के बाद 23 सितंबर 2026 को POR क्रमांक 20/17 मुकेश मरकाम, केशनाथ उर्फ गोलू और अन्य के खिलाफ कथित वन अपराध के संबंध में दर्ज किया गया है।
विभाग यह भी जांच कर रहा है कि मामले में शामिल कुछ लोगों को वर्ष 2015-16 में अन्य स्थानों पर वनाधिकार भूमि पहले से आवंटित की गई थी या नहीं। यदि सरकारी रिकॉर्ड में यह बात स्थापित होती है, तो अतिरिक्त वन भूमि पर कब्जे के कानूनी पहलुओं की जांच की जाएगी।
हाथी कॉरिडोर और वन्यजीवों के आवास पर असर की चिंता
USTR के अनुसार अतिक्रमण प्रभावित क्षेत्र केवल सामान्य वन भूमि नहीं है, बल्कि यह बड़े वन्यजीव आवास और हाथियों के महत्वपूर्ण आवागमन वाले परिदृश्य का हिस्सा है। लगातार पेड़ों की कटाई, गडलिंग और वन भूमि को कृषि क्षेत्र में बदलने से वन्यजीवों के आवास का विखंडन हो सकता है और उनके पारंपरिक आवागमन मार्ग प्रभावित हो सकते हैं।
विभाग का कहना है कि इससे आसपास के गांवों में मानव-हाथी संघर्ष और अन्य मानव-वन्यजीव संघर्ष की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं।
चार साल में 1,050 हेक्टेयर अतिक्रमित वन भूमि मुक्त कराने का दावा
करका में चल रही कार्रवाई को USTR ने वन अतिक्रमण के खिलाफ व्यापक अभियान का हिस्सा बताया है। विभाग के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में करीब 1,050 हेक्टेयर अतिक्रमित वन क्षेत्र को मुक्त कराया गया है।
इसके लिए ड्रोन आधारित निगरानी और मैपिंग, ISRO सैटेलाइट इमेजरी, GPS/DGPS आधारित मैदानी सत्यापन, डिजिटल साक्ष्य, स्वतंत्र गवाहों और दस्तावेजी साक्ष्यों का इस्तेमाल किया जा रहा है। विभाग संबंधित वन एवं वन्यजीव कानूनों के तहत अभियोजन और न्यायालयीन कार्रवाई भी कर रहा है।
65 फीसदी फील्ड स्टाफ के पद खाली
USTR के मुताबिक यह कार्रवाई ऐसे समय में जारी है जब रिजर्व में करीब 65 प्रतिशत फील्ड स्टाफ के पद रिक्त हैं। इससे उपलब्ध फ्रंटलाइन स्टाफ पर काम का दबाव बढ़ा हुआ है।
विभाग के अनुसार पिछले चार वर्षों में वन एवं वन्यजीव संरक्षण कार्य में तैनात टीमों पर पांच गंभीर हमले भी हो चुके हैं। इसके बावजूद फ्रंटलाइन वनकर्मी संरक्षित क्षेत्र के जंगलों और वन्यजीव आवास की सुरक्षा में जुटे हुए हैं। USTR प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि मानव संसाधनों की कमी को वन भूमि पर अतिक्रमण या संरक्षित वन क्षेत्र के विनाश को रोकने में बाधा नहीं बनने दिया जाएगा।

