छत्तीसगढ़ में सरकारी विभागों की लापरवाही और व्यवस्थागत अड़चनों को लेकर एक साथ दो बड़े मामले सामने आए हैं। एक ओर प्रदेश के सरकारी दफ्तरों और विभागों पर बिजली बिल का भारी बकाया है, वहीं दूसरी ओर आंगनबाड़ी केंद्रों में प्री-स्कूल किट की आपूर्ति का टेंडर अटकने से करीब 10 लाख बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने की स्थिति बन गई है।
बिजली बिल के मामले में प्रदेश के सरकारी विभागों पर कुल करीब 3035.37 करोड़ रुपये का बकाया बताया गया है। इनमें नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के निकायों पर सबसे अधिक करीब 1525.18 करोड़ रुपये और पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग से जुड़े निकायों पर करीब 1057.56 करोड़ रुपये की देनदारी बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार सरकारी दफ्तरों में प्रीपेड मीटर/बिलिंग व्यवस्था लागू किए जाने के बावजूद पुराने बकाये की समस्या बनी हुई है।
बिजली कंपनी की ओर से बकाया वसूली के लिए कार्रवाई भी की जा रही है। नियमों के तहत समय पर बिजली बिल का भुगतान नहीं होने पर कनेक्शन काटने की कार्रवाई की जा सकती है। इससे सरकारी कार्यालयों की सेवाओं पर भी असर पड़ने की आशंका है।
दूसरी ओर, प्रदेश के करीब 52 हजार आंगनबाड़ी केंद्रों में प्री-स्कूल किट का टेंडर अटक गया है। इसके कारण लगभग 10 लाख बच्चों की खेल-खेल में पढ़ाई प्रभावित होने की बात सामने आई है। प्री-स्कूल किट में बच्चों की शुरुआती शिक्षा और गतिविधियों से जुड़ी सामग्री उपलब्ध कराई जाती है। टेंडर प्रक्रिया में देरी के चलते कई आंगनबाड़ी केंद्र इन सामग्रियों से वंचित हैं।
एक तरफ सरकार सरकारी विभागों से बिजली बिल का भुगतान कराने के लिए सख्ती कर रही है, तो दूसरी तरफ बच्चों की शुरुआती शिक्षा से जुड़ी जरूरी सामग्री की आपूर्ति में देरी का मामला सामने आया है। दोनों मामलों ने सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली, समय पर भुगतान और टेंडर प्रक्रिया की निगरानी को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

