नारायणपुर/बस्तर। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग का अबूझमाड़ एक बार फिर चर्चा में है। लंबे समय तक नक्सल गतिविधियों का गढ़ रहे इस दुर्गम इलाके में अब सुरक्षा और विकास के साथ-साथ प्रस्तावित सैन्य युद्धाभ्यास रेंज को लेकर आदिवासी समुदाय की चिंताएं सामने आ रही हैं। सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर चल रही चर्चाओं में एयरफोर्स फायरिंग रेंज के विरोध की बात कही जा रही है और दावा किया जा रहा है कि प्रस्तावित सैन्य गतिविधियों के कारण कई गांवों के लोगों को विस्थापन का सामना करना पड़ सकता है।
हालांकि उपलब्ध प्रशासनिक रिकॉर्ड और पूर्व में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार 52 गांवों के प्रभावित होने की बात सेना की प्रस्तावित युद्धाभ्यास रेंज से जुड़ी है। इसे यह कहना सही नहीं होगा कि इन सभी गांवों को तत्काल खाली कराने का अंतिम आदेश जारी हो चुका है। वर्ष 2024 में सामने आई नारायणपुर जिला प्रशासन की एक आंतरिक रिपोर्ट में प्रस्तावित रेंज के दायरे में 52 गांवों का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक इन गांवों में हजारों लोग निवास करते हैं।
54 हजार हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में प्रस्तावित है रेंज
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक अबूझमाड़ के सोनपुर-गरपा क्षेत्र में करीब 54,543 हेक्टेयर भूमि में भारतीय सेना की युद्धाभ्यास रेंज स्थापित करने का प्रस्ताव सामने आया था। छत्तीसगढ़ के राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग ने इस संबंध में नारायणपुर जिला प्रशासन से जानकारी मांगी थी।
वर्ष 2024 में सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक प्रस्तावित क्षेत्र नारायणपुर जिले की कोहकामेटा तहसील के अंतर्गत आने वाली 13 ग्राम पंचायतों के 52 गांवों को प्रभावित कर सकता है। इन गांवों में रहने वाले लोगों के पास घर, कृषि भूमि और अन्य उपयोग की जमीन है।
यही वजह है कि सैन्य रेंज की स्थापना का मुद्दा सिर्फ सुरक्षा से जुड़ा मामला नहीं रह जाता, बल्कि आदिवासी आबादी, जमीन, जंगल और पुनर्वास से भी सीधे जुड़ जाता है।
52 गांवों में कितने लोग प्रभावित हो सकते हैं?
नारायणपुर जिला प्रशासन की उस आंतरिक रिपोर्ट में बताया गया था कि प्रस्तावित क्षेत्र में आने वाले 52 गांवों में करीब 2,417 परिवार और 9,601 लोगों की आबादी है। रिपोर्ट में लगभग 4,834 हेक्टेयर कृषि भूमि और करीब 97 हेक्टेयर आवासीय भूमि का भी उल्लेख किया गया था।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि इन गांवों का राजस्व सर्वेक्षण पूरी तरह नहीं हुआ है। ऐसे में जमीन पर लंबे समय से रह रहे लोगों के अधिकार और संभावित मुआवजे को लेकर भी सवाल महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
यानी यदि भविष्य में इस परियोजना के कारण विस्थापन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो सिर्फ जमीन का अधिग्रहण ही मुद्दा नहीं होगा, बल्कि पुनर्वास, मुआवजा, खेती, घर, आजीविका और पारंपरिक वनाधिकार जैसे सवाल भी सामने आएंगे।
आदिवासियों की सबसे बड़ी चिंता क्या है?
अबूझमाड़ में रहने वाले आदिवासी समुदायों की आजीविका लंबे समय से जंगल और जमीन से जुड़ी रही है। यहां के कई गांव अत्यंत दुर्गम इलाकों में बसे हैं। ऐसे में किसी बड़े सैन्य क्षेत्र की स्थापना का असर स्थानीय लोगों की आवाजाही और पारंपरिक जीवनशैली पर पड़ सकता है।
स्थानीय स्तर पर उठ रही आपत्तियों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर किसी क्षेत्र को सैन्य अभ्यास या फायरिंग के लिए निर्धारित किया जाता है तो वहां रहने वाले ग्रामीणों के भविष्य का क्या होगा?
ग्रामीणों के लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं होती। उसी जमीन पर खेती, घर, पशुपालन और जंगल से मिलने वाले संसाधनों के माध्यम से उनकी रोजी-रोटी चलती है। इसलिए संभावित विस्थापन की चर्चा के साथ स्थानीय ग्रामसभा की भूमिका और ग्रामीणों की सहमति/आपत्तियों का मुद्दा भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
क्या 52 गांव तत्काल खाली होंगे?
यहां सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि 52 गांवों को तत्काल खाली कराने का अंतिम आदेश होने की पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से नहीं होती।
52 गांवों का आंकड़ा 2024 में सामने आई जिला प्रशासन की आंतरिक रिपोर्ट से जुड़ा है। उस समय रिपोर्ट में प्रस्तावित सेना युद्धाभ्यास रेंज के दायरे में आने वाले गांवों और संभावित प्रभावित आबादी का आकलन किया गया था।
इसलिए मौजूदा समय में इसे इस तरह समझना ज्यादा उचित होगा कि प्रस्तावित सैन्य रेंज की वजह से 52 गांव संभावित रूप से प्रभावित हो सकते हैं, जबकि वास्तविक विस्थापन, पुनर्वास या मुआवजे की प्रक्रिया अलग प्रशासनिक निर्णयों पर निर्भर करेगी।
अबूझमाड़ में लगातार बदल रही तस्वीर
अबूझमाड़ की तस्वीर पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदली है। कभी माओवादी गतिविधियों के कारण बाहरी दुनिया से काफी हद तक कटे रहने वाले इस इलाके में अब सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ी है। सड़क, मोबाइल नेटवर्क, स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशासनिक पहुंच बढ़ाने के प्रयास भी किए जा रहे हैं।
2026 में भी अबूझमाड़ से जुड़ी खबरों में बदलाव की तस्वीर सामने आई है। अक्टूबर 2026 में नारायणपुर के भाटपाल गांव में पुराने सुरक्षा कैंप को आदिवासी विद्यार्थियों के लिए छात्रावास में बदलने की जानकारी सामने आई। प्रशासन के मुताबिक सुरक्षा स्थिति में सुधार के बाद इस बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल शिक्षा के लिए किया जा रहा है।
इसी तरह अगस्त 2026 में बीएसएफ की ओर से अबूझमाड़ के दूरस्थ इलाकों में ‘हर घर तिरंगा’ अभियान चलाए जाने की जानकारी भी सरकारी स्तर पर जारी की गई थी।
ऐसे समय में सैन्य अभ्यास रेंज का मुद्दा सामने आने से यह बहस फिर तेज हो सकती है कि अबूझमाड़ में सुरक्षा जरूरतों और स्थानीय आदिवासी आबादी के अधिकारों के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाए।
विकास और सुरक्षा के बीच जमीन का सवाल
अबूझमाड़ में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के पीछे सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की अपनी रणनीतिक जरूरतें हैं। सेना की युद्धाभ्यास रेंज का उद्देश्य सैनिकों को वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में प्रशिक्षण देने के लिए निर्धारित क्षेत्र उपलब्ध कराना होता है। 2024 में सेना से जुड़े अधिकारियों के हवाले से बताया गया था कि ऐसी रेंज में टैंक प्रशिक्षण और विभिन्न युद्धक्षेत्र परिस्थितियों का अभ्यास कराया जाता है।
लेकिन दूसरी ओर, यदि प्रस्तावित क्षेत्र में पहले से ग्रामीण आबादी और कृषि भूमि मौजूद है तो जमीन के इस्तेमाल को लेकर स्थानीय लोगों की चिंताओं को दूर करना भी जरूरी होगा।
यही वजह है कि अबूझमाड़ में फायरिंग या युद्धाभ्यास रेंज का मुद्दा आने वाले समय में सुरक्षा बनाम विस्थापन, विकास बनाम पारंपरिक अधिकार और सरकारी परियोजना बनाम ग्रामसभा की चिंताओं के बीच बड़ी बहस का विषय बन सकता है।
फिलहाल क्या है स्थिति?
उपलब्ध दस्तावेजों और रिपोर्टों के आधार पर फिलहाल इतना कहा जा सकता है कि अबूझमाड़ में सेना की युद्धाभ्यास रेंज के लिए भूमि संबंधी प्रस्ताव पहले सामने आ चुका है और इसके संभावित प्रभाव वाले 52 गांवों का प्रशासनिक आकलन भी किया गया था। 52 गांवों में करीब 9,601 लोगों के रहने की बात उस रिपोर्ट में कही गई थी।
अबूझमाड़ के आदिवासी इलाकों में उठ रही आवाजों ने इस पुराने प्रस्ताव को फिर चर्चा में ला दिया है। आने वाले दिनों में प्रशासन की ओर से यदि परियोजना, सर्वे, ग्रामसभा, भूमि अधिग्रहण या पुनर्वास को लेकर कोई नया आदेश या आधिकारिक जानकारी जारी होती है, तो उससे इस पूरे मामले की वास्तविक स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।

