गिरीश गुप्ता गरियाबंद। जिले के आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्र फिंगेश्वर विकासखंड के मोटीपानी गांव में शिक्षा व्यवस्था की बदहाली एक बार फिर सामने आई है। यहां प्राथमिक शाला के बच्चों को पिछले चार वर्षों से गाय के कोठे (गोठान/पशुशाला) में पढ़ाई करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। हालात इतने खराब हैं कि बरसात के दिनों में छत से लगातार पानी टपकता है और बच्चे भीगते हुए पढ़ाई करते हैं। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार शिकायत और प्रशासनिक आश्वासन के बावजूद नया स्कूल भवन अब तक पूरा नहीं हो सका है।
जानकारी के अनुसार, मोटीपानी गांव का पुराना प्राथमिक स्कूल भवन वर्ष 2002 में जर्जर घोषित होने के बाद गिरा दिया गया था। इसके बाद लंबे समय तक बच्चों की पढ़ाई वैकल्पिक व्यवस्था में संचालित होती रही। करीब चार वर्ष पहले नए स्कूल भवन का निर्माण शुरू किया गया, लेकिन निर्माण कार्य बीच में ही रुक गया। परिणामस्वरूप गांव के 41 छात्र-छात्राएं आज भी पशुओं के कोठे में बैठकर पढ़ाई करने को विवश हैं।
बरसात के मौसम में स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। जिस भवन में कक्षाएं संचालित हो रही हैं, उसकी छत जगह-जगह से टपकती है। ऐसे में बच्चों और शिक्षकों को कभी एक कोने तो कभी दूसरे कोने में बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती है। कई बार पानी भर जाने के कारण कक्षाएं प्रभावित होती हैं। इससे बच्चों की नियमित पढ़ाई और शिक्षा की गुणवत्ता पर भी असर पड़ रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि नए स्कूल भवन के निर्माण की मांग कई वर्षों से की जा रही है। मामले की जानकारी प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को भी दी गई। ग्रामीणों के अनुसार जिला प्रशासन की ओर से जल्द निर्माण पूरा कराने का आश्वासन भी मिला था, लेकिन जमीनी स्तर पर अब तक कोई ठोस प्रगति दिखाई नहीं दे रही है। अधूरा भवन आज भी निर्माण पूरा होने का इंतजार कर रहा है।
ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण एजेंसी और संबंधित विभाग की लापरवाही के कारण काम समय पर पूरा नहीं हो सका। यदि समय पर निर्माण पूरा हो जाता तो बच्चों को इस तरह असुरक्षित माहौल में पढ़ाई नहीं करनी पड़ती। गांव के अभिभावकों का कहना है कि वे अपने बच्चों की सुरक्षा और भविष्य को लेकर चिंतित हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों का भी मानना है कि किसी भी बच्चे को सुरक्षित और सुविधायुक्त वातावरण में शिक्षा मिलना उसका मूल अधिकार है। जर्जर या अस्थायी भवनों में कक्षाएं संचालित होने से न केवल पढ़ाई प्रभावित होती है, बल्कि बच्चों की सुरक्षा पर भी खतरा बना रहता है।
अब ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि अधूरे स्कूल भवन का निर्माण जल्द से जल्द पूरा कराया जाए और बच्चों को सुरक्षित एवं स्थायी स्कूल भवन उपलब्ध कराया जाए। लोगों का कहना है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे।
मोटीपानी की यह तस्वीर ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के बुनियादी ढांचे की वास्तविक स्थिति को उजागर करती है। एक ओर सरकार शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और स्कूलों में सुविधाएं बढ़ाने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर इस गांव के बच्चे आज भी गाय के कोठे में बैठकर अपना भविष्य संवारने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इन बच्चों को उनका हक कब मिलेगा और अधूरा स्कूल भवन कब पूरा होगा?

