नई दिल्ली: भारत में गरीबी और आर्थिक असमानता को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के आंकड़े साझा किए हैं। उन्होंने बताया कि 2011 से 2023 के बीच देश में करीब 49.6 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए। इस अवधि में अत्यधिक गरीबी की दर में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। प्रधानमंत्री ने यह जानकारी इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट के जरिए दी।
मोदी के मुताबिक, गरीबी कम करना सरकार के लिए केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि एक संकल्प है। उन्होंने रोजगार के अवसर बढ़ने और आर्थिक असमानता घटने का भी जिक्र किया। प्रधानमंत्री ने बताया कि पिछले छह वर्षों में देश में 13.4 करोड़ नए रोजगार के अवसर बढ़े हैं। यह कामकाजी उम्र की आबादी में हुई वृद्धि से लगभग दोगुना है। ये आंकड़े वर्ल्ड बैंक की अक्टूबर में जारी रिपोर्ट ‘इंडिया पॉवर्टी एंड इक्विटी ब्रीफ’ में दिए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अत्यधिक गरीबी की दर 2011 में 27.1% थी, जो 2023 में घटकर 2.6% रह गई।
गरीबी और आर्थिक असमानता में कितनी आई कमी?
प्रधानमंत्री मोदी ने रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि भारत में गरीबी कम होने की रफ्तार दुनिया में सबसे तेज रही है। उन्होंने आर्थिक असमानता में सुधार को भी महत्वपूर्ण बताया। इसके लिए गिनी इंडेक्स का उदाहरण दिया गया, जो किसी देश में आय के बंटवारे की असमानता को मापता है। मोदी के अनुसार, इस सूचकांक में 20% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है और यह घटकर 23.0 पर आ गया है। इसका मतलब है कि देश में आर्थिक असमानता के स्तर में कमी आई है।
रिपोर्ट में कम आय वाले लोगों से जुड़ा एक और आंकड़ा दिया गया है। इसके मुताबिक, प्रतिदिन 4.20 डॉलर यानी करीब 400 रुपये से कम पर गुजारा करने वाले लोगों की आबादी 2011 में 57.7% थी। 2023 तक यह घटकर 16.1% रह गई। अनुमान है कि 2028 तक यह आंकड़ा और कम होकर 12.1% हो सकता है।
गरीबी कम होने के पीछे बताई गईं तीन बड़ी वजहें
रिपोर्ट में गरीबी घटने के पीछे लोगों की खपत में बढ़ोतरी, महिलाओं की रोजगार में भागीदारी और सरकारी सहायता जैसी वजहों को अहम माना गया है।
1. लोगों की खरीदने की क्षमता बढ़ी: आम परिवारों की आय और खर्च करने की क्षमता में सुधार हुआ है। इससे लोगों के जीवन स्तर पर सकारात्मक असर पड़ा है।
2. ग्रामीण महिलाओं को रोजगार के अवसर मिले: रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 से 2023 के बीच करीब 13.4 करोड़ नए काम के अवसर बने। इस दौरान ग्रामीण महिलाओं को विशेष रूप से फायदा हुआ और बड़ी संख्या में महिलाएं पहली बार कमाई वाले कामों से जुड़ीं।
3. सरकारी योजनाओं से मिला सहारा: गरीब परिवारों को मुफ्त राशन और सीधे बैंक खातों में आर्थिक सहायता भेजने जैसी योजनाओं से मदद मिली। इन सुविधाओं ने जरूरतमंद परिवारों पर आर्थिक दबाव कम करने में भूमिका निभाई।
मकान, बिजली और पानी जैसी सुविधाओं में भी सुधार
गरीबी का आकलन केवल आमदनी के आधार पर नहीं किया जाता। लोगों को रहने के लिए घर, बिजली, साफ पानी, शौचालय और रसोई गैस जैसी सुविधाएं मिल रही हैं या नहीं, यह भी जीवन स्तर का अहम हिस्सा है। इसे नॉन-मॉनेटरी गरीबी कहा जाता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले दो दशकों में इन बुनियादी सुविधाओं तक लोगों की पहुंच बढ़ी है।
ऑक्सफोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, 2005-06 में भारत की 53.8% आबादी इन जरूरी सुविधाओं से वंचित थी। 2019-21 तक यह हिस्सा घटकर 16.4% रह गया। वहीं, वर्ल्ड बैंक के अपने आकलन के अनुसार, 2022-23 में इस तरह की गरीबी का स्तर 15.5% था।
उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में अब भी बड़ी चुनौती
गरीबी के आंकड़ों में सुधार के बावजूद देश के कुछ हिस्सों में स्थिति अभी भी चिंता का विषय है। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के कुल गरीबों में से लगभग 57% लोग उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल के बीच के इलाकों में रहते हैं। ऐसे क्षेत्रों में बेहतर और स्थायी रोजगार उपलब्ध कराना बड़ी जरूरत है।
रिपोर्ट में युवाओं के रोजगार को लेकर भी चिंता जताई गई है। युवाओं में बेरोजगारी की दर 14.6% से बढ़कर 15.9% हो गई है। इसमें ग्रामीण युवा महिलाओं की हिस्सेदारी अधिक बताई गई है। एक दूसरी समस्या यह है कि रोजगार मिलने के बावजूद लोगों की कमाई में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो रही है। इसकी वजह यह है कि बड़ी संख्या में लोगों को कम आय वाले कामों में रोजगार मिला है। ऐसे में केवल रोजगार के अवसर बढ़ाना काफी नहीं होगा, बल्कि बेहतर वेतन और स्थायी काम उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
कुल मिलाकर, वर्ल्ड बैंक के आंकड़े भारत में गरीबी घटने और बुनियादी सुविधाओं की पहुंच बढ़ने की तस्वीर पेश करते हैं। हालांकि, युवाओं की बेरोजगारी, कम आय वाले रोजगार और कुछ राज्यों में गरीबी का अधिक बोझ अब भी बड़ी चुनौतियां बने हुए हैं।

