नई दिल्ली। दुनिया के कई देश इन दिनों तेजी से घटती जन्मदर की समस्या से जूझ रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि सरकारें लोगों से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील कर रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यही स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो आने वाले दशकों में आबादी में भारी गिरावट देखने को मिल सकती है।
सबसे ज्यादा चिंता दक्षिण कोरिया में है, जहां दुनिया की सबसे कम जन्मदर दर्ज की गई है। सरकार ने चेतावनी दी है कि यदि जन्मदर में सुधार नहीं हुआ तो भविष्य में देश की आबादी तेजी से घटेगी, जिसका असर अर्थव्यवस्था, रोजगार और सामाजिक व्यवस्था पर पड़ेगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, युवाओं में शादी की घटती संख्या, महंगी जीवनशैली, बच्चों की परवरिश का बढ़ता खर्च, करियर को प्राथमिकता और घरों की ऊंची कीमतें जन्मदर गिरने के प्रमुख कारण हैं। यही वजह है कि बड़ी संख्या में दंपति या तो बच्चे नहीं चाहते या फिर केवल एक ही बच्चा पैदा कर रहे हैं।
घटती आबादी का असर सिर्फ जनसंख्या तक सीमित नहीं रहेगा। इससे कामकाजी लोगों की संख्या कम होगी, बुजुर्गों की आबादी बढ़ेगी और पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं तथा श्रमबल पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। उद्योगों और अर्थव्यवस्था को भी इसका सीधा नुकसान हो सकता है।
स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने बच्चों के पालन-पोषण पर आर्थिक सहायता, टैक्स में राहत, सस्ती चाइल्डकेयर सुविधाएं, मातृत्व और पितृत्व अवकाश जैसी कई योजनाएं शुरू की हैं। इसके बावजूद अब तक अपेक्षित सुधार देखने को नहीं मिला है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले 40 से 50 वर्षों में कई देशों की आबादी में बड़ी गिरावट दर्ज हो सकती है। हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि कोई देश पूरी तरह “गायब” हो जाएगा। चुनौती गंभीर है, लेकिन समाधान भी संभव हैं यदि जन्मदर बढ़ाने वाली नीतियां सफल होती हैं।

