सुप्रीम कोर्ट (Photo Credits: IANS)
नई दिल्ली, 27 मई: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने देश की चुनावी प्रक्रिया की शुद्धता को लेकर बुधवार को एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा मतदाता सूचियों के पुनर्गठन के लिए चलाए गए ‘विशेष गहन संशोधन’ (Special Intensive Revision – SIR) अभियान की संवैधानिक वैधता को पूरी तरह बरकरार रखा है. न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यह कवायद पूरी तरह संवैधानिक, कानूनी रूप से तर्कसंगत है और इसे केवल इसलिए असंवैधानिक या अवैध घोषित नहीं किया जा सकता क्योंकि यह सामान्य मतदाता संशोधन की नियमित प्रक्रियाओं से भिन्न है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने इस साल जनवरी में सभी पक्षों की लंबी दलीलें सुनने के बाद सुरक्षित रखा अपना फैसला आज सार्वजनिक किया. यह भी पढ़ें: SIR: मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट आज सुनाएगा बड़ा फैसला
वोटर लिस्ट से नाम हटना नागरिकता का अंत नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने इस कवायद को “वैध और संवैधानिक” बताते हुए कहा कि इसका मुख्य उद्देश्य मतदाता सूचियों की सटीकता, शुद्धता और पारदर्शिता को बहाल करना है. अदालत ने अपने फैसले में एक बहुत ही महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु को स्पष्ट करते हुए कहा कि चुनाव आयोग की शक्तियां केवल मतदाता सूची में शामिल होने के लिए किसी व्यक्ति की पात्रता (Eligibility) निर्धारित करने तक ही सीमित हैं.
अदालत ने कहा, “निर्वाचन आयोग के पास किसी व्यक्ति की नागरिकता (Citizenship Status) का निर्धारण करने का कोई संप्रभु अधिकार नहीं है. यदि इस प्रक्रिया के तहत किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटा (Delete) दिया जाता है, तो भी उस व्यक्ति की भारतीय नागरिकता समाप्त नहीं होती है, क्योंकि नागरिकता का निर्धारण केवल कानून के तहत गठित सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) द्वारा ही किया जा सकता है.”
अनुच्छेद 324 और वैधानिक ढांचे से मिलती है शक्ति
याचिकाकर्ताओं की मुख्य चुनौती यह थी कि क्या चुनाव आयोग को किसी नागरिक की साख जांचने और पैतृक कड़ियों के आधार पर उसे मतदाता सूची से बाहर करने का अधिकार है. इस पर पीठ ने स्पष्ट किया कि ‘SIR’ प्रक्रिया चुनाव आयोग को नागरिकता के सवालों पर फैसला करने की कोई विशेष या अनियंत्रित शक्ति नहीं देती है.
अदालत ने पाया कि यह अभ्यास जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत नहीं है. शीर्ष अदालत के अनुसार, चुनाव आयोग की यह विशेष कवायद सीधे तौर पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 (चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण) तथा मतदाता सूचियों को नियंत्रित करने वाले वैधानिक ढांचे से अपनी वैधता और शक्ति प्राप्त करती है.
आधार (Aadhaar) भी सत्यापन के लिए एक वैध दस्तावेज; प्रक्रिया न्यायिक समीक्षा के अधीन
चुनाव आयोग द्वारा पहचान और पात्रता के प्रमाण के रूप में निर्धारित किए गए 11 दस्तावेजों की अनिवार्यता पर भी कोर्ट ने बड़ा रुख अपनाया. कोर्ट ने होल्ड किया कि आयोग द्वारा बताए गए दस्तावेज केवल सांकेतिक (Indicative) हैं, न कि संपूर्ण या अंतिम. अदालत ने अपने पुराने निर्देश को दोहराते हुए कहा कि मतदाता सत्यापन की सुविधा के लिए आधार (Aadhaar) को भी एक अतिरिक्त सांकेतिक दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया जा सकता है.
साथ ही, पीठ ने मतदाताओं को आश्वस्त करते हुए कहा कि पूरी ‘SIR’ प्रक्रिया न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में बनी रहेगी. यदि किसी योग्य मतदाता का नाम दुर्भावनापूर्ण या गलत तरीके से काटा जाता है, तो वह मनमानी कार्रवाई के खिलाफ उपयुक्त कानूनी मंचों और अदालतों का दरवाजा खटखटाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है. कोर्ट ने आयोग को हिदायत दी कि मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने और योग्य मतदाताओं के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के बीच एक सटीक संतुलन (Calibrated Balance) बनाए रखना अनिवार्य है.
बिहार से शुरू होकर अन्य चुनावी राज्यों तक फैली थी यह कवायद
यह पूरा मामला तब शुरू हुआ था जब चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में इस विशेष गहन संशोधन (SIR) को लागू करने का आदेश जारी किया था, जिसके बाद इस फैसले को अदालत में चुनौती दी गई. याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि चुनाव से ठीक पहले सीमित समय सीमा के भीतर करोड़ों लोगों के मतदान अधिकारों की जांच करना मनमाना कदम है और इसे चुनाव के बाद अधिक व्यापक रूप से किया जाना चाहिए था.
सुनवाई के दौरान, अदालत ने पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग को निर्देश दिए थे कि जिन लोगों के नाम सूची में शामिल किए गए हैं, उनकी सूची को सार्वजनिक और सुलभ स्थानों पर प्रकाशित किया जाए ताकि आम लोग आसानी से अपने स्टेटस का मिलान कर सकें. कोर्ट ने इस प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद चुनाव आयोग ने बिहार के साथ-साथ चुनाव वाले अन्य राज्यों—पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में भी इस सफल संशोधन प्रक्रिया को पूरा किया.

