नई दिल्ली। चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में चल रहे Special Intensive Revision (SIR) को लेकर The Indian Express की पत्रकार रितिका चोपड़ा की एक जांच रिपोर्ट ने देश की चुनावी व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है। 23 सितंबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले करीब 10 महीनों में आयोग के भीतर लिए गए कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं।
रिपोर्ट में मुख्य सवाल मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया, Form-6 में बदलाव, ECINet सॉफ्टवेयर पर नियंत्रण, पश्चिम बंगाल में मतदाता अपीलों और गोवा में 97 पात्र मतदाताओं के नाम शामिल नहीं हो पाने को लेकर उठाए गए हैं। हालांकि, इन दावों के जवाब में चुनाव आयोग ने कहा है कि उसके सभी निर्णय और प्रशासनिक निर्देश कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप हैं तथा आयोग के भीतर अलग-अलग विचार या टिप्पणियां किसी संस्थान की सामान्य deliberation का हिस्सा हो सकती हैं। आयोग के अधिकारियों ने यह भी कहा कि पिछले एक साल में सभी फैसले तीनों आयुक्तों की सहमति से हुए।
क्या है पूरा मामला?
The Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार से जून 2025 में शुरू हुई SIR प्रक्रिया के तहत देश के कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों की व्यापक समीक्षा की गई। रिपोर्ट में कहा गया कि इस प्रक्रिया में ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए। हालांकि, नाम हटने का मतलब हर मामले में अंतिम रूप से मताधिकार समाप्त होना नहीं है, क्योंकि संबंधित मतदाताओं के लिए आपत्ति और अपील की प्रक्रियाएं भी हैं।
इसी प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयुक्तों की ओर से कथित तौर पर कई सवाल उठाए गए।
Form-6 में बदलाव पर आपत्ति
नए मतदाता के रूप में नाम जुड़वाने के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में SIR से संबंधित एक नया सवाल जोड़े जाने को लेकर विवाद सामने आया।
रिपोर्ट के अनुसार, नए आवेदकों से पूछा जाने लगा कि उनका नाम अथवा उनके माता-पिता/दादा-दादी का नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में था या नहीं। रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई में इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज की थी और कहा था कि नियमों में बदलाव किए बिना Form-6 में इस तरह परिवर्तन नहीं किया जा सकता।
बाद में सुखबीर सिंह संधू ने भी इस पर आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने अगस्त में इसे “unauthorised and illegal” बताते हुए इसे तत्काल हटाने की बात कही थी।
ECINet को लेकर क्या सवाल उठा?
रिपोर्ट का एक बड़ा हिस्सा चुनावी डेटा और मतदाता सूची को संभालने वाले डिजिटल सिस्टम ECINet से जुड़ा है।
आमतौर पर निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची तैयार और नियंत्रित करने की जिम्मेदारी Electoral Registration Officer यानी ERO की होती है। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बात पर चिंता जताई कि मतदाता सूची से जुड़े डिजिटल सिस्टम का नियंत्रण धीरे-धीरे केंद्रीकृत होता जा रहा है और इससे जमीनी स्तर के अधिकारियों की भूमिका प्रभावित हो सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने इस विषय से संबंधित कुछ मामलों में कैबिनेट सचिव को भी पत्र लिखे।
गोवा के 97 मतदाताओं का मामला
इस पूरे विवाद में गोवा के 97 मतदाताओं का मामला खास तौर पर सामने आया है।
The Indian Express के अनुसार, इन मतदाताओं के मामलों की स्थानीय स्तर पर Electoral Registration Officers ने जांच की और दस्तावेजों के आधार पर उन्हें अंतिम मतदाता सूची में शामिल करने के योग्य पाया।
लेकिन रिपोर्ट में दावा किया गया कि उस समय इस्तेमाल किए जा रहे सॉफ्टवेयर में पहले हटाए गए नामों को स्थानीय स्तर से दोबारा शामिल करने के लिए जरूरी rollback/re-inclusion विकल्प उपलब्ध नहीं था।
गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने कथित तौर पर इस संबंध में चुनाव आयोग को सात दिनों के भीतर आठ बार ईमेल भेजे। इसके बावजूद 21 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद भी इन 97 लोगों के नाम उसमें शामिल नहीं हो पाए। The Indian Express ने 20 सितंबर तक इन सभी 97 नामों को अंतिम सूची में नहीं होने की बात कही है।
पश्चिम बंगाल में भी उठा सवाल
रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल के SIR से जुड़े मामलों का भी उल्लेख है। सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रिया के तहत कुछ मतदाताओं के मामलों की न्यायिक अधिकारियों द्वारा जांच की गई थी।
रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ मामलों में मतदाताओं को सूची में शामिल रखने के फैसले के खिलाफ अपीलें दायर की गईं। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने कथित तौर पर यह सवाल उठाया कि ऐसी अपीलें किसके अधिकार से और किस प्रक्रिया के तहत दायर की गईं।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग की ओर से स्पष्टीकरण जारी किया गया। आयोग ने कहा कि अलग-अलग मुद्दों पर अधिकारियों की टिप्पणियां और विचार-विमर्श किसी संस्थान की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
आयोग के अनुसार उसके आधिकारिक आदेश और प्रशासनिक निर्देश कानूनी आधार पर जारी किए जाते हैं। आयोग ने यह भी कहा कि पिछले एक साल में लिए गए सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से हुए हैं।
EC ने ECINet को लेकर भी कहा कि उसका डिजिटल सिस्टम कड़े डेटा-सिक्योरिटी प्रोटोकॉल के तहत काम करता है, ताकि अनधिकृत बदलाव या डेटा से छेड़छाड़ रोकी जा सके।
क्यों महत्वपूर्ण है यह विवाद?
इस पूरे मामले का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि मतदाता सूची सीधे नागरिकों के मताधिकार से जुड़ी है। एक तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट और शुद्ध करना है, वहीं दूसरी तरफ रिपोर्ट में आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों और सॉफ्टवेयर से जुड़ी प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए गए हैं।
फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर इतना स्पष्ट है कि रितिका चोपड़ा की जांच रिपोर्ट ने चुनाव आयोग के भीतर मतदाता सूची, डिजिटल सिस्टम और SIR की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सार्वजनिक बहस शुरू कर दी है। हालांकि, रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों और निष्कर्षों को चुनाव आयोग के पक्ष के साथ पढ़ना जरूरी है; उपलब्ध सामग्री के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि इन घटनाओं से चुनाव परिणाम प्रभावित हुए हैं।

