नई दिल्ली। सौरभ त्रिपाठी से जुड़े “Fake IAS” नैरेटिव पर सोशल मीडिया की चर्चा के बीच एक क्रिएटर की सार्वजनिक Instagram Reel तथ्य-जाँच की जरूरत की ओर ध्यान दिलाती है। @cbisht12 के कैप्शन में संबंधित वीडियो हटाने, आगे सावधानी बरतने और त्रिपाठी को ठेस पहुँचने पर खेद व्यक्त करने की बात लिखी है।
कैप्शन में क्या लिखा है?
Reel के साथ प्रकाशित लिखित संदेश इस प्रकार है:
“मैं समझता हूँ कि किसी भी व्यक्ति के बारे में जानकारी साझा करने से पहले तथ्यों की पुष्टि करना ज़रूरी है। मैंने संबंधित वीडियो अपने पेज से हटा दी है और भविष्य में अधिक सावधानी बरतूँगा।
यदि मेरी वीडियो से सौरभ त्रिपाठी जी को ठेस पहुँची है, तो मैं इसके लिए खेद व्यक्त करता हूँ।
धन्यवाद।🙏🙏”
माफ़ी वाली मूल Instagram Reel
यह उद्धरण Reel के लिखित कैप्शन का है। संदेश का सार है कि व्यक्ति के बारे में सामग्री साझा करने से पहले तथ्य परखने चाहिए। वीडियो हटाए जाने की बात क्रिएटर का अपना कथन है। माफ़ीनामा अपने आप में किसी आरोप की सत्यता या किसी न्यायिक मामले का नतीजा तय नहीं करता।
WAMIS से जुड़ी भूमिका का रिकॉर्ड
त्रिपाठी के पेशेवर संदर्भ का एक उदाहरण 29 जनवरी 2022 की टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट है। बिहार के नौ विभागों में WAMIS लागू करने की तैयारी वाली उस रिपोर्ट में उन्हें WAMIS प्रोजेक्ट मैनेजर के रूप में उद्धृत किया गया था।
WAMIS का पूरा नाम Works Accounts Management Information System है। रिपोर्ट में परियोजनाओं की प्रगति, बिल निस्तारण, हेल्पडेस्क और प्रशिक्षण से संबंधित जानकारी दी गई थी। यह उस समय की परियोजना-प्रबंधन भूमिका का उल्लेख है; इसे वर्तमान नियुक्ति अथवा IAS पद की पुष्टि नहीं माना जा सकता।
तस्वीरों और वायरल दावों को संदर्भ के साथ समझना जरूरी
सरकारी तकनीकी परियोजनाओं में अधिकारियों से बैठक और समन्वय काम का हिस्सा हो सकते हैं। किसी अधिकारी के साथ तस्वीर मात्र से यह स्थापित नहीं होता कि तस्वीर में मौजूद व्यक्ति ने किसी पद का झूठा दावा किया। ऐसा निष्कर्ष संबंधित कथन और प्रमाणों की जाँच के बाद ही निकाला जाना चाहिए।
सोशल मीडिया सामग्री में आरोप, दस्तावेजों में दर्ज पेशेवर भूमिका और न्यायिक निष्कर्ष के बीच अंतर स्पष्ट रहना चाहिए। क्रिएटर का सार्वजनिक खेद इस जरूरत को सामने लाता है कि सामग्री साझा करते समय सटीक शब्दों और सत्यापन को प्राथमिकता दी जाए।

