नई दिल्ली। कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। तमिलनाडु सरकार ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर कर्नाटक को कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के निर्देशों का पालन करते हुए तत्काल पानी छोड़ने का निर्देश देने की मांग की है। तमिलनाडु का कहना है कि राज्य में उपलब्ध जल भंडार सीमित है और इसका असर किसानों की सिंचाई तथा आने वाली फसलों पर पड़ रहा है।
6 हजार क्यूसेक पानी छोड़ने का निर्देश
विवाद का ताजा केंद्र CWMA का 8 सितंबर का फैसला है। प्राधिकरण ने कर्नाटक को 9 सितंबर से 23 सितंबर तक बिलिगुंडुलु में प्रतिदिन 6,000 क्यूसेक पानी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था। CWMA ने यह फैसला कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) की सिफारिश के बाद लिया था।
तमिलनाडु का आरोप है कि कर्नाटक इस निर्देश का पूरी तरह पालन नहीं कर रहा है। राज्य ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि 9 सितंबर को बिलिगुंडुलु में औसत प्रवाह करीब 4,218 क्यूसेक रहा, जो अगले दिन 2,412 क्यूसेक और 11 सितंबर को घटकर करीब 1,695 क्यूसेक रह गया।
तमिलनाडु ने 16 TMC पानी की कमी का मुद्दा उठाया
तमिलनाडु ने अपनी याचिका में 1 जून से 9 सितंबर के बीच करीब 16 टीएमसी फीट पानी की कमी का दावा किया है। राज्य ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि इस कमी को भी आनुपातिक आधार पर पूरा कराने के निर्देश दिए जाएं।
राज्य सरकार का कहना है कि कावेरी जल की उपलब्धता में कमी का सीधा असर डेल्टा क्षेत्र की कृषि पर पड़ा है। तमिलनाडु के मुताबिक, इस साल मेट्टूर बांध से डेल्टा क्षेत्र की सिंचाई के लिए पानी सामान्य समय 12 जून के बजाय 1 सितंबर को छोड़ा जा सका।
मेट्टूर बांध में सीमित पानी का हवाला
तमिलनाडु ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि मेट्टूर जलाशय में उपलब्ध पानी सीमित है और मौजूदा भंडार से सिंचाई की जरूरत लगभग 25 से 30 दिन तक ही पूरी हो सकती है। ऐसे में राज्य ने कर्नाटक से तत्काल पानी छोड़े जाने को जरूरी बताया है।
तमिलनाडु का कहना है कि इस स्थिति में यदि कर्नाटक निर्धारित मात्रा में पानी नहीं छोड़ता है तो राज्य की कृषि गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। खासतौर पर कावेरी डेल्टा में धान की फसल को लेकर चिंता जताई गई है।
कर्नाटक का क्या कहना है?
दूसरी ओर, कर्नाटक सरकार कावेरी जल छोड़ने को लेकर अपनी अलग चिंताएं पहले ही सामने रख चुकी है। कर्नाटक के जल संसाधन मंत्री एन. चेलुवरायस्वामी ने सितंबर की शुरुआत में कहा था कि राज्य के कावेरी बेसिन में पानी की आवक में कमी आई है और राज्य को अपने पेयजल तथा अन्य जरूरतों को भी ध्यान में रखना है। उन्होंने CWMA के 6,000 क्यूसेक वाले निर्देश को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही थी।
कर्नाटक का तर्क है कि राज्य के जलाशयों में उपलब्ध पानी और आने वाली आवक को देखते हुए तमिलनाडु के लिए निर्धारित मात्रा में पानी छोड़ना उसके लिए चुनौतीपूर्ण है। इस पूरे विवाद में दोनों राज्यों के बीच सबसे बड़ा मतभेद उपलब्ध पानी की मात्रा और संकट की स्थिति में आनुपातिक बंटवारे को लेकर है।
अगस्त में भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था मामला
कावेरी विवाद को लेकर यह पहली बार नहीं है जब इस साल सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचा है। अगस्त में भी तमिलनाडु ने शीर्ष अदालत का रुख किया था। उस समय अदालत ने तमिलनाडु को अपनी आनुपातिक जल हिस्सेदारी से जुड़ी मांग CWMA के सामने रखने को कहा था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक द्वारा CWMA के निर्देशों के अनुपालन और पानी छोड़ने की स्थिति पर भी सुनवाई की।
31 अगस्त की सुनवाई के दौरान कर्नाटक ने अदालत को बताया था कि वह CWMA द्वारा निर्धारित 9,000 क्यूसेक प्रतिदिन के निर्देश का पालन कर रहा है और कुछ दिनों में निर्धारित मात्रा से अधिक पानी भी छोड़ा गया। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 15 सितंबर की तारीख तय की थी।
कावेरी विवाद की पुरानी पृष्ठभूमि
कावेरी जल विवाद कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच लंबे समय से चला आ रहा अंतरराज्यीय जल विवाद है। बारिश कम होने वाले वर्षों में दोनों राज्यों के बीच पानी छोड़ने की मात्रा को लेकर तनाव बढ़ जाता है।
सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले के बाद कावेरी जल प्रबंधन से जुड़ी संस्थागत व्यवस्था लागू हुई। CWMA और CWRC को जल प्रवाह और राज्यों के बीच निर्धारित हिस्सेदारी से जुड़े मामलों की निगरानी की जिम्मेदारी दी गई। इसके बावजूद कम बारिश या जलाशयों में कम पानी होने की स्थिति में पानी छोड़ने को लेकर दोनों राज्यों के बीच विवाद सामने आते रहे हैं।
किसानों पर पड़ रहा असर
तमिलनाडु सरकार का कहना है कि कावेरी जल की कमी का सबसे सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है। राज्य के कावेरी डेल्टा क्षेत्र में सिंचाई के लिए नदी और जलाशयों पर काफी निर्भरता है। इस साल मेट्टूर बांध से पानी छोड़े जाने में देरी के कारण किसानों के बीच चिंता बढ़ी है। तमिलनाडु के किसान संगठनों ने भी राज्य सरकार से कावेरी जल के मुद्दे पर केंद्र और सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
अब सुप्रीम कोर्ट में आगे क्या?
तमिलनाडु की नई याचिका में मुख्य मांग यह है कि कर्नाटक को CWMA के निर्देश के मुताबिक पानी छोड़ने के लिए बाध्य किया जाए। साथ ही राज्य ने जून से सितंबर के बीच बताए गए जल-घाटे को भी पूरा करने की मांग की है।
मामले में कर्नाटक का पक्ष भी महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि राज्य पहले ही CWMA के 6,000 क्यूसेक वाले निर्देश को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कह चुका है। ऐसे में आने वाली सुनवाई में अदालत के सामने CWMA के निर्देशों के अनुपालन, दोनों राज्यों में उपलब्ध जल भंडार, वास्तविक जल प्रवाह और कृषि व पेयजल जरूरतों से जुड़े आंकड़े महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
फिलहाल विवाद का केंद्र यही है कि CWMA द्वारा निर्धारित 6,000 क्यूसेक दैनिक प्रवाह कितना सुनिश्चित हुआ और क्या तमिलनाडु को उसके दावे के मुताबिक पिछली कमी का पानी भी मिल पाएगा। सुप्रीम कोर्ट के सामने दोनों राज्यों के ताजा आंकड़ों और दलीलों के आधार पर आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।

