रायपुर। मेडिकल की पढ़ाई को लेकर एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। दावा किया जा रहा है कि कुछ एजेंसियां करीब 30 से 35 लाख रुपए में किर्गिस्तान, फिलीपींस और उज्बेकिस्तान जैसे देशों से MBBS की डिग्री दिलाने का रास्ता बता रही हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि छात्रों को नियमित रूप से विदेश जाकर पढ़ाई करने के बजाय कम उपस्थिति या कथित ‘डिस्टेंस मोड’ के जरिए डिग्री हासिल करने का भरोसा दिलाया जा रहा है। एक प्रमुख अखबार की प्रकाशित पड़ताल में ऐसे दावों और एजेंसियों के काम करने के तरीके को सामने रखा गया है।
‘घर बैठे MBBS’ का दावा कितना सच?
पड़ताल में सामने आया कि कुछ एजेंसियों के प्रतिनिधि छात्रों और अभिभावकों को विदेश से MBBS कराने का प्रस्ताव दे रहे हैं। एक एजेंसी के कथित प्रतिनिधि ने बताया कि वह उज्बेकिस्तान समेत कई देशों में छात्रों को भेजती है। बातचीत में यह भी दावा सामने आया कि छात्र को लंबे समय तक विदेश में रहने की जरूरत नहीं होगी और कुछ समय बाद परीक्षा देकर डिग्री हासिल की जा सकती है।
एक अन्य बातचीत में एजेंसी की ओर से यह दावा किया गया कि किर्गिस्तान और फिलीपींस में इस तरह की ‘सेटिंग’ मौजूद है। कथित तौर पर इसके लिए नियमित MBBS की तुलना में कम उपस्थिति और अतिरिक्त भुगतान की बात कही गई। पड़ताल में ऐसे दावों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
50 हजार रुपए अतिरिक्त देकर उपस्थिति से बचने का दावा
रिपोर्ट में ‘पैराशूट डॉक्टर’ नाम से सामने आए एक हिस्से में आरोप लगाया गया है कि कुछ एजेंसियां छात्रों को नियमित उपस्थिति से बचाने के लिए अतिरिक्त रकम लेने की बात करती हैं। बातचीत में करीब 50 हजार रुपए अतिरिक्त लेकर उपस्थिति संबंधी समस्या से बचाने का दावा सामने आया।
यह व्यवस्था इसलिए भी चिंता बढ़ाती है क्योंकि मेडिकल शिक्षा केवल डिग्री हासिल करने तक सीमित नहीं है। डॉक्टर बनने के लिए क्लासरूम पढ़ाई के साथ-साथ प्रैक्टिकल ट्रेनिंग, क्लिनिकल एक्सपोजर, अस्पताल में प्रशिक्षण और मरीजों के साथ वास्तविक अनुभव बेहद महत्वपूर्ण हैं।
‘डिस्टेंस MBBS’ के लिए 3 से 4 लाख रुपए अतिरिक्त
पड़ताल के दूसरे हिस्से में एक एजेंट से जब नियमित और कथित ‘डिस्टेंस MBBS’ की लागत को लेकर सवाल किया गया तो उसने सामान्य MBBS की तुलना में डिस्टेंस व्यवस्था के लिए अतिरिक्त भुगतान की बात कही। बातचीत में 30 से 35 लाख रुपए तक की फीस और डिस्टेंस व्यवस्था के लिए करीब 3 से 4 लाख रुपए अतिरिक्त देने की बात सामने आई।
एजेंसी से जुड़े व्यक्ति ने यह भी दावा किया कि छात्र विदेश जाने के बजाय भारत में रहकर कुछ प्रक्रिया पूरी कर सकता है। हालांकि, ऐसे दावों को वैध मानने से पहले संबंधित विदेशी विश्वविद्यालय, मेडिकल कॉलेज और भारत में उसकी डिग्री की मान्यता की स्वतंत्र रूप से जांच करना जरूरी है।
छात्रों को विदेश ले जाने का भी दावा
पड़ताल में एक महिला एजेंट से भी बातचीत का उल्लेख है। एजेंट ने छात्रों को विदेश ले जाने और किर्गिस्तान में MBBS कराने की बात कही। बातचीत में यह भी संकेत मिला कि एजेंसी का नेटवर्क छात्रों को विदेश में मेडिकल शिक्षा के नाम पर दाखिला दिलाने का काम करता है।
रिपोर्ट में ऐसे कुछ एजेंसियों के बारे में भी बताया गया है जो करियर काउंसलिंग के नाम पर अभिभावकों तक पहुंचती हैं। रायपुर के अलग-अलग इलाकों में ऐसे सेंटर चलने और छात्रों को विदेश में मेडिकल पढ़ाई के लिए भेजने का दावा किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक एजेंसियों को प्रति छात्र कमीशन मिलने की बात भी सामने आई है।
मेडिकल शिक्षा में ‘शॉर्टकट’ कितना खतरनाक?
विदेश से मेडिकल की पढ़ाई करना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। बड़ी संख्या में भारतीय छात्र विदेशों में मेडिकल शिक्षा प्राप्त करते हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब कोई संस्था या एजेंट बिना नियमित पढ़ाई, क्लिनिकल ट्रेनिंग या आवश्यक शैक्षणिक मानकों के डिग्री दिलाने का दावा करता है।
भारत में विदेशी मेडिकल स्नातकों के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) के नियम लागू होते हैं। NMC के Foreign Medical Graduate Licentiate Regulations के तहत विदेशी मेडिकल स्नातकों की शिक्षा और भारत में आगे की प्रक्रिया के लिए निर्धारित मानक हैं। नियमों के अनुसार पात्र विदेशी मेडिकल स्नातकों को भारत में निर्धारित अवधि की supervised internship भी करनी होती है।
इसलिए केवल किसी विदेशी विश्वविद्यालय से MBBS की डिग्री मिल जाना पर्याप्त नहीं है। भारत में मेडिकल प्रैक्टिस के लिए संबंधित नियमों और लाइसेंसिंग प्रक्रिया को पूरा करना जरूरी है।
NMC की मंजूरी और मानकों की जांच जरूरी
NMC छात्रों को विदेश में मेडिकल पढ़ाई के लिए जाने से पहले संबंधित संस्थान और पाठ्यक्रम की पात्रता तथा लागू नियमों की जानकारी लेने की सलाह देता है। आयोग की वेबसाइट पर विदेश में मेडिकल शिक्षा लेने वाले छात्रों के लिए अलग से जानकारी उपलब्ध है।
NMC ने विदेशी मेडिकल शिक्षा से जुड़े नियमों और FMGL Regulations को भी स्पष्ट किया है। इसलिए किसी भी एजेंट के इस दावे पर भरोसा करना कि ‘बस परीक्षा देनी होगी और MBBS की डिग्री मिल जाएगी’, छात्रों के लिए बड़ा जोखिम हो सकता है।
अभिभावकों के लिए सबसे बड़ा सवाल
विदेश में मेडिकल शिक्षा के नाम पर लाखों रुपए खर्च करने वाले परिवारों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस डिग्री के लिए वे पैसा दे रहे हैं, वह भारत में भविष्य में मेडिकल रजिस्ट्रेशन के लिए स्वीकार्य होगी या नहीं।
पड़ताल में सामने आए कथित ऑफर और ‘डिस्टेंस MBBS’ जैसे दावों को देखते हुए छात्रों को दाखिला लेने से पहले विश्वविद्यालय की मान्यता, पाठ्यक्रम की अवधि, क्लिनिकल ट्रेनिंग, उपस्थिति, परीक्षा व्यवस्था और भारत में लागू NMC नियमों की जांच करनी चाहिए।
सीधी बात यह है कि MBBS जैसी पेशेवर डिग्री में शॉर्टकट का दावा भविष्य में छात्र के करियर के लिए भारी नुकसान साबित हो सकता है। किसी एजेंसी द्वारा किए गए मौखिक दावे के आधार पर लाखों रुपए देने के बजाय संबंधित विश्वविद्यालय और NMC के आधिकारिक दस्तावेजों से जानकारी की पुष्टि करना जरूरी है।

