धमतरी-गरियाबंद (छत्तीसगढ़) । महानदी के उद्गम क्षेत्र उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व (USTR) के करका अतिक्रमण क्षेत्र में जंगल का तेजी से नुकसान हो रहा है। 2016 में जहां यह अतिक्रमण मात्र 22 हेक्टेयर था, वहीं 2026 में यह बढ़कर 102.47 हेक्टेयर हो गया है। एक दशक में क्षेत्रफल चार गुने से भी अधिक हो गया।
हाल ही में किए गए डीजीपीएस-सक्षम ड्रोन सर्वेक्षण और इसरो की 2010 तथा 2016 की सैटेलाइट इमेजरी के तुलनात्मक अध्ययन से अनुमान लगाया गया है कि 2016 से 2026 के बीच प्रभावित क्षेत्र में 1.25 लाख से अधिक पेड़ साफ कर दिए गए हैं। क्षेत्रीय निरीक्षणों में 3,500 से अधिक पेड़ गडर्लिंग (छाल चारों ओर से काटकर) से प्रभावित पाए गए हैं। इनमें मुख्य रूप से साल, बीजा और तेंदू के पेड़ शामिल हैं।

गडर्लिंग की प्रक्रिया में पेड़ के तने के चारों ओर छाल की पट्टी हटा दी जाती है, जिससे पोषक तत्वों का परिवहन बाधित होता है और पेड़ धीरे-धीरे मर सकता है। कई पेड़ पिछले वर्षों से इस क्षति का सामना कर रहे हैं, जबकि कुछ पर हाल ही में गडर्लिंग के निशान मिले हैं। इससे अतिक्रमण बढ़ाने के उद्देश्य से जानबूझकर पेड़ों को नुकसान पहुंचाने की आशंका भी जताई जा रही है।
इन चुनौतियों के बावजूद USTR प्रशासन ने मैदानी अमले में लगभग 65 प्रतिशत पद रिक्त होने के बावजूद पिछले चार वर्षों में 1,000 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया है। इस दौरान वन संरक्षण दल पर पांच घातक हमले भी हुए और प्रशासन को अत्याचार के निराधार आरोपों का सामना करना पड़ा। इन प्रयासों से बाघ, हाथी, भारतीय विशाल गिलहरी और मालाबार पाइड हॉर्नबिल जैसे वन्यजीवों के आवासों के संरक्षण और पुनर्स्थापन को बल मिला है।

ट्री डॉक्टर की मदद से पेड़ों को बचाने की कोशिश
गडर्लिंग से प्रभावित पेड़ों को बचाने के लिए रिजर्व ने 2022 में तौरेगा रेंज में ब्रिज ग्राफ्टिंग तकनीक का इस्तेमाल किया था, लेकिन सफलता दर महज 10 प्रतिशत रही। अब कर्नाटक के ‘ट्री डॉक्टर’ विजय निशांत (प्रोजेक्ट वृक्ष फाउंडेशन) अगले सप्ताह रिजर्व का दौरा करेंगे। वे प्रभावित पेड़ों का आकलन करेंगे, किन पेड़ों को वैज्ञानिक हस्तक्षेप से बचाया जा सकता है, इसकी पहचान करेंगे और ब्रिज ग्राफ्टिंग सहित उपयुक्त वृक्ष-सर्जरी तथा पुनर्स्थापन तकनीकों पर मार्गदर्शन देंगे। मैदानी कर्मचारियों को भी विशेष उपचार प्रक्रियाओं, बाद की देखभाल और नियमित निगरानी का प्रशिक्षण दिया जाएगा।
साथ ही रिजर्व प्रशासन आसपास के आदिवासी समुदायों और वनवासियों से भी परामर्श कर रहा है, ताकि पेड़ों की देखभाल से जुड़ा उनका पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान वैज्ञानिक तरीकों के साथ जोड़ा जा सके।
उप वन निदेशक कार्यालय, उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि इस पहल का मकसद मूल्यवान पेड़ों को नष्ट होने से बचाना, अतिक्रमण से जंगलों की रक्षा करना और महानदी के उद्गम क्षेत्र की प्राकृतिक विरासत को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना है।


