तिल्दा-नेवरा। औद्योगिक क्षेत्र के रूप में तेजी से उभर रहा तिल्दा-नेवरा आज देश के कई उद्योगपतियों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में जमीनों के दाम आसमान छू रहे हैं। ग्रामीणों को अपनी जमीन के बदले अच्छी कीमत मिल रही है, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं। नए कारखानों के निर्माण से व्यापारियों का कारोबार भी फल-फूल रहा है। आसपास के गांवों में किराये के मकानों की मांग तक बढ़ गई है।

लेकिन इस विकास के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है। आखिर कुछ उद्योगपतियों को उद्योग लगाने में बाधाओं का सामना क्यों करना पड़ रहा है?
शासन की निर्धारित प्रक्रिया के तहत ग्राम पंचायतों द्वारा उद्योगों के लिए एनओसी जारी की जाती है। उद्योगपति पंचायत की एनओसी और शासन के नियमों के आधार पर जमीन, निर्माण और मशीनरी में करोड़ों रुपये का निवेश करते हैं। इसके बावजूद बाद में एनओसी को फर्जी बताकर विरोध और धरना-प्रदर्शन शुरू हो जाता है।
आखिर ऐसी स्थिति क्यों बनती है? जब उद्योगपति अपनी पूंजी लगाकर क्षेत्र में रोजगार और आर्थिक गतिविधियां बढ़ाना चाहते हैं, तो उन्हें बार-बार विवादों और अनिश्चितताओं का सामना क्यों करना पड़ता है? निवेश करने के बाद भी उद्योग शुरू नहीं हो पाना उद्योगपतियों के साथ-साथ क्षेत्र के विकास के लिए भी चिंता का विषय है।
सवाल शासन-प्रशासन से है—यदि तिल्दा-नेवरा को औद्योगिक विकास के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, तो उद्योगपतियों के निवेश की सुरक्षा और उद्योग स्थापना की प्रक्रिया को सुगम बनाने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?
उद्योगपतियों को अनावश्यक विवादों से राहत मिले, ग्रामीणों के हित सुरक्षित रहें और नियमों का पारदर्शी तरीके से पालन हो। क्योंकि उद्योग लगेंगे तो रोजगार बढ़ेगा, व्यापार बढ़ेगा और तिल्दा-नेवरा विकास की नई ऊंचाइयों को छुएगा।


