इंदौर हाईकोर्ट की सख्ती: जमीन विवाद में आदेश को लेकर घिरे महू के SDM, सात दिन के भीतर राशि जमा करने के निर्देश
इंदौर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने जमीन विवाद से जुड़े एक मामले में महू के एसडीएम के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने सुनवाई के दौरान कानूनी प्रावधानों को लेकर सवाल किए, लेकिन संतोषजनक जवाब नहीं मिलने और न्यायालय के निर्देशों के पालन में देरी के मामले को गंभीरता से लेते हुए एसडीएम पर 50 हजार रुपये की कॉस्ट (लागत) लगा दी। अदालत ने यह राशि सात दिन के भीतर मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा करने का निर्देश दिया।
क्या है पूरा मामला?
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मामला इंदौर जिले की महू तहसील के बारडिया गांव में करीब एक हेक्टेयर जमीन से जुड़े विवाद का है। जमीन पर कब्जे को लेकर पक्षों के बीच विवाद चल रहा था।
इस मामले में महू के एसडीएम ने 9 जून 2026 को पहले लगाए गए प्रतिबंध को हटा दिया था। एसडीएम के इस आदेश को याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से आदेश की वैधानिकता पर सवाल उठाते हुए हस्तक्षेप की मांग की।
जज ने पूछा- किस कानूनी प्रावधान के तहत हटाई रोक?
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने एसडीएम के आदेश को लेकर सवाल उठाए। अदालत ने जानना चाहा कि जमीन पर पहले लगाई गई रोक हटाने के लिए किस कानूनी प्रावधान का सहारा लिया गया था।
रिपोर्टों के मुताबिक, सुनवाई के दौरान एसडीएम अदालत के सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दे सके। इसके अलावा, न्यायालय के निर्देशों के पालन में हुई देरी को भी अदालत ने गंभीरता से लिया।
सात दिन में जमा करने होंगे 50 हजार रुपये
मामले में एसडीएम के रवैये पर नाराजगी जताते हुए हाईकोर्ट ने 50 हजार रुपये की कॉस्ट लगाने का निर्देश दिया। अदालत ने यह राशि सात दिन के भीतर मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा करने को कहा।
न्यायालय की इस कार्रवाई को प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि न्यायिक प्रक्रिया और अदालत के निर्देशों का पालन गंभीरता से किया जाना चाहिए।
प्रशासनिक अधिकारियों के लिए क्या है संदेश?
इस मामले ने एक बार फिर राजस्व अधिकारियों के न्यायिक और प्रशासनिक दायित्वों पर ध्यान आकर्षित किया है। जमीन से जुड़े विवादों में अधिकारियों को संबंधित कानूनों और निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुसार निर्णय लेना होता है।
हाईकोर्ट की कार्रवाई से स्पष्ट है कि प्रशासनिक आदेशों को न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं माना जा सकता। यदि किसी आदेश की वैधानिकता पर सवाल उठते हैं, तो संबंधित अधिकारी को अदालत के सामने उसका उचित आधार प्रस्तुत करना पड़ता है।

