पुरी। ओडिशा के पुरी स्थित विश्वप्रसिद्ध में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के अगले दिन पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ नंदोत्सव मनाया गया। श्रीमंदिर में सुबह से ही धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला शुरू हो गया। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की खुशी में मनाए जाने वाले इस उत्सव के दौरान मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना और पारंपरिक कार्यक्रम आयोजित किए गए।
नंदोत्सव को लेकर पुरी में श्रद्धालुओं में खास उत्साह देखने को मिला। बड़ी संख्या में भक्त भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के दर्शन के लिए श्रीमंदिर पहुंचे। मंदिर परिसर और आसपास के इलाकों में धार्मिक वातावरण बना रहा।
जन्माष्टमी के अगले दिन मनाया जाता है नंदोत्सव
हिंदू धार्मिक परंपरा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के अगले दिन नंदोत्सव मनाया जाता है। मान्यता है कि भगवान कृष्ण के जन्म की खबर मिलते ही उनके पालक पिता नंद बाबा के घर उत्सव मनाया गया था। इसी प्रसंग की स्मृति में नंदोत्सव की परंपरा चली आ रही है।
पुरी श्रीमंदिर में भी इस पर्व का विशेष धार्मिक महत्व है। यहां नंदोत्सव केवल एक सामान्य उत्सव नहीं, बल्कि मंदिर की सदियों पुरानी परंपराओं और सेवायतों द्वारा निभाई जाने वाली विशेष विधियों का हिस्सा है।
श्रीमंदिर में निभाई गईं विशेष परंपराएं
नंदोत्सव के अवसर पर श्रीमंदिर में निर्धारित परंपराओं के अनुसार भगवान की विशेष सेवा और पूजा की गई। मंदिर से जुड़े सेवायतों ने परंपरागत विधि-विधान के साथ विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए।
उत्सव के दौरान भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप से जुड़े प्रसंगों को विशेष महत्व दिया गया। मंदिर की परंपरा में भगवान के जन्म और उसके बाद होने वाले उत्सवों को अलग-अलग धार्मिक विधियों के माध्यम से मनाया जाता है।
इस दौरान श्रद्धालुओं ने भजन-कीर्तन और भगवान के जयकारे लगाए। मंदिर परिसर में ‘जय जगन्नाथ’ और ‘जय श्रीकृष्ण’ के जयघोष से वातावरण भक्तिमय बना रहा।
भगवान के बाल स्वरूप की झलक पाने उमड़े श्रद्धालु
नंदोत्सव के अवसर पर भक्तों में विशेष उत्साह देखा गया। श्रद्धालुओं का मानना है कि इस पावन अवसर पर भगवान के बाल स्वरूप का स्मरण और पूजा करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
सुबह से ही मंदिर के आसपास श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ गई। दूर-दराज से पुरी पहुंचे भक्तों ने भगवान जगन्नाथ के दर्शन किए और नंदोत्सव के धार्मिक माहौल का हिस्सा बने।
पुरी में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए श्रीमंदिर का हर प्रमुख पर्व विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। रथयात्रा, स्नान पूर्णिमा, जन्माष्टमी और नंदोत्सव जैसे अवसरों पर मंदिर की परंपराओं को देखने और भगवान का आशीर्वाद लेने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
श्रीमंदिर की परंपराओं में नंदोत्सव का विशेष महत्व
पुरी श्रीमंदिर की पहचान केवल भगवान जगन्नाथ की पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां सदियों से चली आ रही धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं भी इसकी विशेष पहचान हैं। मंदिर में वर्षभर अलग-अलग पर्वों के दौरान विशेष सेवाएं और अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।
नंदोत्सव भी इन्हीं महत्वपूर्ण धार्मिक परंपराओं में शामिल है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद नंद बाबा के घर मनाई गई खुशी को प्रतीकात्मक रूप से इस उत्सव में अभिव्यक्त किया जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का बाल स्वरूप वात्सल्य, प्रेम और आनंद का प्रतीक है। इसलिए नंदोत्सव को खुशी और उल्लास का पर्व माना जाता है।
पुरी में बना रहा भक्तिमय माहौल
नंदोत्सव के चलते पुरी में सुबह से ही धार्मिक माहौल देखने को मिला। मंदिर के आसपास श्रद्धालुओं की भीड़ रही। भक्तों ने भगवान के दर्शन के साथ पूजा-अर्चना की और अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।
श्रीजगन्नाथ धाम में आयोजित होने वाले प्रत्येक धार्मिक उत्सव की तरह नंदोत्सव में भी स्थानीय परंपराओं और वैष्णव संस्कृति की झलक देखने को मिली। मंदिर की प्राचीन परंपराओं के अनुसार सेवायतों द्वारा निभाई गई धार्मिक सेवाओं ने उत्सव को और विशेष बना दिया।
क्यों खास है पुरी का नंदोत्सव?
पुरी श्रीमंदिर में मनाया जाने वाला नंदोत्सव इसलिए खास है क्योंकि यहां भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े पर्व श्रीजगन्नाथ परंपरा और मंदिर की विशिष्ट धार्मिक सेवाओं के साथ जुड़े हुए हैं। यही वजह है कि जन्माष्टमी के बाद नंदोत्सव के दिन भी भक्तों में विशेष आस्था और उत्साह देखने को मिलता है।

