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सरकारी नौकरी वाली पत्नी को भी मिलेगा भरण-पोषण? छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
रायपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सरकारी नौकरी करने वाली पत्नी भी अपने पति से भरण-पोषण का अधिकार रखती है। यह फैसला उन अनगिनत महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण लेकर आया है जो आर्थिक रूप से सक्षम होने के बावजूद अपने पतियों से गुजारा भत्ता पाने की हकदार हैं। इस फैसले ने भारतीय कानून में भरण-पोषण के प्रावधानों को एक नई दिशा दी है।
पृष्ठभूमि
आम तौर पर यह धारणा रही है कि यदि पत्नी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है, विशेषकर सरकारी नौकरी में है, तो उसे भरण-पोषण का अधिकार नहीं होगा। इसी सोच के चलते कई मामलों में अदालतों ने ऐसी महिलाओं की भरण-पोषण की याचिकाएं खारिज कर दी थीं। लेकिन, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस रूढ़िवादी सोच को चुनौती देते हुए एक प्रगतिशील निर्णय दिया है, जो लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को बल देता है।
विस्तृत जानकारी
यह महत्वपूर्ण फैसला जस्टिस गौतम भादुड़ी और जस्टिस एन.के. व्यास की युगलपीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान सुनाया। मामले में पति ने अपनी पत्नी के सरकारी नौकरी में होने का हवाला देते हुए भरण-पोषण की राशि देने से इनकार कर दिया था। पति का तर्क था कि पत्नी आर्थिक रूप से सक्षम है, इसलिए उसे गुजारा भत्ता नहीं मिलना चाहिए। हालांकि, हाईकोर्ट ने पति के इस तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि पत्नी का आर्थिक रूप से सक्षम होना उसके पति से भरण-पोषण का अधिकार छीन नहीं लेता। अदालत ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का अधिकार व्यक्ति की आवश्यकता पर आधारित है, न कि उसकी आर्थिक स्थिति पर।
मुख्य बिंदु
- सरकारी नौकरी करने वाली पत्नी भी भरण-पोषण की हकदार है।
- भरण-पोषण का अधिकार आवश्यकता पर आधारित है, न कि आर्थिक आत्मनिर्भरता पर।
- यह फैसला लैंगिक समानता को बढ़ावा देता है।
- पति का यह तर्क मान्य नहीं कि पत्नी की नौकरी उसे भरण-पोषण से वंचित कर दे।
प्रभाव और आगे की स्थिति
इस फैसले का दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। यह उन महिलाओं को सशक्त करेगा जो घरेलू हिंसा या अन्य कारणों से अपने पतियों से अलग रह रही हैं और आर्थिक तंगी का सामना कर रही हैं। अब वे अपनी नौकरी के बावजूद भी न्याय की उम्मीद कर सकेंगी। यह फैसला यह भी सुनिश्चित करेगा कि पति अपनी पत्नी की देखभाल की जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त न हो सके, भले ही वह आर्थिक रूप से सक्षम हो। यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका में महिलाओं के अधिकारों के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता को दर्शाता है।
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