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कोणार्क सूर्य मंदिर के बारे में वो सबकुछ जो आप जरूर जानना चाहेंगे

उड़ीसा वर्तमान के ओड़िशा राज्य में पुरी से लगभग 35 किलोमिटर की दूरी पर स्थित कोणार्क का सूर्य मंदिर आज भी अपनी ऐतिहासिक विरासत को सहेजे हुए है। यूनेस्कों की सूची में शामिल व भारत के सात अजूबों में से एक कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण 13 वीं शताब्दी में हुआ था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि पूर्वी गंगा सम्राज्य के राजा लांगूल नृसिंहदेव ने मंदिर का निर्माण 1253 से 1260 ई. के मध्य कराया था।

यह मंदिर मध्यकालिन वास्तुकला के कलिंग शैली में बना हुआ है। जिसका आकार सूर्य भगवान के रथ के सामान है। मंदिर के मुख्य द्वार 12 जोड़ी रथ के पहिए और सात घोड़े बने हुए है। प्रत्येक पहिए में आठ चक्र है जो समय के आठों पहर को दर्शाते हैं व 12 जोड़ी पहिए दिन के चौबीस घंटे का बोध कराते है।

हालांकि वर्तमान समय में अधिकांश पहिए और घोड़े टुटे हुए अवस्था में है। ऐसा माना जाता है कि मुगल शासकों और अंग्रेजों ने कई बार इस मंदिर पर आक्रमण कर इसे तोड़ने के प्रयास किया था। भविष्य पुराण और सांबा पुराण के अनुसार इस मंदिर के पहले भी यहां एक प्राचीन सूर्य मंदिर था। जिसका निर्माण भगवान कृष्ण के बेटे सांबा ने अपना कुष्ठ रोग को ठीक करने के लिए चंद्रभागा नदी के तट पर कराया था।

इस मंदिर में नहीं होती पूजा :

यह आश्चर्य कि बात है कि इस मंदिर में पूजा – पाठ नहीं होता है। दर्शन करने वाले सैलानियों के लिए किसी तरह की रोक रूकावट नहीं है। वह मंदिर परिसर में अपने सामान, जूते चप्पल, कैमरा – फोन आदि अपने साथ ला सकते है।अगर चलित कथाओं की माने तो इस मंदिर में कभी पूजा नहीं हुई और अब तक ये मंदिर एक वर्जिन मंदिर है। कहा जाता है की मंदिर के प्रमुख वास्तुकार के पुत्र ने मंदिर के निर्माण के समय मुख्य मंडप पर एक आकृति बना दिया, जिसके बाद राजा क्रोधित हो गए और सभी वास्तुकारों को मारने की घोषणा कर दी। जिसके बाद मुख्य वास्तुकार के पुत्र ने मंदिर के अंदर ही आत्महत्या कर ली जिससे बाद से इस मंदिर में पूजा या किसी भी धार्मिक अनुष्ठान पर पूर्णतः प्रतिबन्ध लगा दिया गया।

मंदिर का रहस्यमय चुम्बक:

इस सूर्य मंदिर के शिखर पर एक चुम्बक पत्थर लगा हुआ था जिसके प्रभाव से, कोणार्क के समुद्र से गुजरने वाले सागरपोत या विमान इसकी तरफ खिंचे चले आते थे। बाद में मुगल व अंग्रेज शासकों ने मंदिर पर चढ़ाई कर इस चुंबकीय पॉवर को तहस नहस कर दिया। माना जाता है कि यह चुंबक मंदिर की दिवारों में संतुलन बनाए रखने के लिए लगाया गया था।

जहां रथ के पहिए को देखकर समय का पता लगता है :

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह भी है कि यहा लगे रथ के पहिए पर पड़ने वाली सूर्य की किरणों को देखकर समय का पता लग जाता है। मंदिर के मुख्य द्वार को बंद कर दिया गया है। साथ ही मंदिर के तीन तरफ सूर्य भगवान की मूर्ती लगी हुई है जो भगवान सूर्य के विभिन्न स्वरूपों को दर्शाती है। मंदिर परिसर के चारो तरफ सुंदर घास का मैदान भी है जो मंदिर की शोभा में चार चांद लगाता है।

कैसे यहां आये :

पुरी स्टेशन से लगभग 40 किलोमिटर की दूरी पर स्थित है यह मंदिर। आप यहां गाड़ी बुक कर के या बस के माध्यम से आ सकते है। बस स्टैंड से नियमित अंतराल पर सूर्य मंदिर के लिए बसें चलती है। मंदिर के मुख्य द्वार के दोनों किनारे दुकानें भी लगी हैं जहां से आप खरीददारी कर सकते हैं।

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