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नागरिकता संशोधन कानून देश हित में, महात्मा गांधी के विचार को नहीं मान रही है कांग्रेस : प्रभाकर पटनायक

नागरिकता संशोधन कानून

AISKYA के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रभाकर पटनायक ने कहा कि कांग्रेस कभी भी राष्ट्र नीति के अनुसार नहीं चलती है. केवल वोट नीति करती है. उसे देश से कुछ भी लेना देना नहीं है. नागरिकता संशोधन अधिनियम देश हित में है, पर तथाकथित धर्मनिरपेक्षता का स्वांग करने वाली कांग्रेस, वामपंथी पार्टियां व इनके साथ चल रहे अन्य दल लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा कर रहे हैं. इसका विरोध करने वाले इसे गैर-संवैधानिक बता रहे हैं जबकि सरकार का कहना है कि इसका कोई भी प्रावधान संविधान के किसी भी तरह से अवहेलना नहीं करता है।

वहीं, इस कानून के जरिए धर्म के आधार पर भेदभाव के आरोपों पर सरकार का कहना है कि इस कानून से उनकी भारतीय नागरिकता छिन जाएगी जबकि सरकार ने कई बार साफ किया है कि यह कानून नागरिकता देने के लिए है, न कि नागरिकता छीनने के लिए। एक बड़ी आबादी को CAA और NRC में अंतर के बारे में ठीक से नहीं पता है।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस कह रही थी. पर अभी की सरकार ने लोक सभा और राज्य सभा से पारित करा कर इसे लागू कर दिया. ये कोई भाजापा अकेले पार्लमेंट में बैठ कर पारित किया है क्या I फिर किस बात का विरोध हो रहा है. अल्पसंख्यकों को अनावश्यक क्यों गुमराह किया जा रहा है. कांग्रेस का मतलब केवल हिंदू और मुसलमानों के बीच भेद पैदा करना है

महात्मा गांधी ने कहा था कि पाकिस्तान से प्रताड़ित होकर आनेवाले अल्पसंख्यकों को भारत में नौकरी सहित अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराना चाहिए। जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि प्रधानमंत्री आकस्मिक निधि का उपयोग पाक से आनेवाले अल्पसंख्यकों के लिए किया जाना चाहिए। कांग्रेस के दो पूर्व अध्यक्ष पट्टाभि सीतारमैया , जे॰ बी॰ कृपलानी ने भी इस तरह की बात कही थी। इंदिरा गांधी ने कहा था कि पूर्वोत्तर के राज्यों में भ्रमण कर बांग्लादेश व पाक से आये अल्पसंख्यकों के दुख को साझा करना चाहती हूँ I सन २००३ में मनमोहन सिंह ने विपक्ष के नेता के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से मांग की थी कि बांग्लादेश जैसे देशों से प्रताड़ित होकर आ रहे अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने में हमें ज्यादा उदार होना चाहिए। उन्होंने भाषण में कहा था…

“मैं उम्मीद करता हूं कि माननीय उप प्रधानमंत्री इस संबंध में नागरिकता कानून को लेकर भविष्य की रूपरेखा तैयार करते समय ध्यान देंगे “

तब तत्कालीन उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि विपक्ष के नेता (सिंह) ने जो कहा, उसका वह पूरा समर्थन करते हैं।
इसी तरह के विचार साम्यवादी नेता डी राजा ने भी व्यक्त किए थे और कहा था कि बंगाली हिन्दुओं को नागरिकता देने में सहयोग किया जाय।

पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश धर्म के आधार पर विभाजन हुवा था I भारत में वसुधैव कुटुंबकम की भावना चलती है. यहां अल्पसंख्यक कल्याण विभाग है. इसके माध्यम से अल्पसंख्यकों के सुख-सुविधा का ध्यान रखा जाता है. इसके लिए योजनाएं बनायी जाती है. पर पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित किया जाता है. नेहरू व लियाकत समझौता में अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने की बात थी. पाक ने इसका पालन नहीं किया. भारत में इसका पालन किया।

देश विभाजन के बाद योगेंद्र मंडल पाकिस्तान में कानून मंत्री बनाये गये थे पर वहां अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार को लेकर उन्होंने वर्ष 1950 में इस्तीफा दिया था और शरणार्थी के रूप में भारत के बंगाल में रह रहे थे. शरणार्थी के रूप में ही उनकी मौत हुई .इससे पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति के बारे में जाना जा सकता है।

इस नागरिकता संशोधन कानून के तहत पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश से प्रताड़ित होकर 31 December 2014 के पहले आए हिंदू, सिख, ईसाई, पारसी, जैन और बुद्ध धर्मावलंबियों को भारत की नागरिकता दी जाएगी।

बता दे की नागरिकता संशोधन कानून को लेकर दो तरह के प्रदर्शन हो रहे हैं। पहला प्रदर्शन नॉर्थ ईस्ट में हो रहा है जो इस बात को लेकर है कि इस ऐक्ट को लागू करने से असम में बाहर के लोग आकर बसेंगे जिससे उनकी संस्कृति को खतरा है। वहीं नॉर्थ ईस्ट को छोड़ भारत के शेष हिस्से में इस बात को लेकर प्रदर्शन हो रहा है कि यह गैर-संवैधानिक है।

प्रदर्शनकारियों के बीच अफवाह फैली है कि इस कानून से उनकी भारतीय नागरिकता छिन सकती है। जबकि सरकार ने कई बार बार साफ किया है कि यह कानून नागरिकता देने के लिए है, न कि नागरिकता छीनने के लिए। पटनायक ने इस मौके पर नागरिकता कानून और इसमें संशोधन को समझाने की कोशिश की है

नागरिकता कानून 1955 क्या है?

नागरिकता कानून, 1955 का संबंध भारतीय नागरिकता अधिग्रहण करने और नागरिकता तय करने के लिए है। भारत के संविधान के साथ ही नागरिकता कानून, 1955 में भारत की नागरिकता से संबंधित विस्तृत कानून है। किसी व्यक्ति को नागरिकता देने के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 (पार्ट II) में प्रावधान किए गए हैं।

नागरिकता कानून, 1955 के मुताबिक अवैध प्रवासियों को भारत की नागरिकता नहीं मिल सकती है। इस कानून के तहत उनलोगों को अवैध प्रवासी माना गया है जो भारत में वैध यात्रा दस्तावेज जैसे पासपोर्ट और वीजा के बगैर घुस आए हों या फिर वैध दस्तावेज के साथ तो भारत में आए हों लेकिन उसमें उल्लिखित अवधि से ज्यादा समय तक यहां रुक जाएं।

नागरिकता संशोधन विधेयक, 2016 क्या था?

नागरिकता कानून, 1955 में बदलाव के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक, 2016 पेश किया गया था। यह विधेयक 19 जुलाई, 2016 को पेश किया गया था। इसमें भारत के तीन मुस्लिम पड़ोसी देशों बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए अवैध गैर मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान है। 12 अगस्त, 2016 को इसे संयुक्त संसदीय कमिटी के पास भेजा गया था। कमिटी ने 7 जनवरी, 2019 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। उसके बाद अगले दिन यानी 8 जनवरी, 2019 को विधेयक को लोकसभा में पास किया गया। लेकिन उस समय राज्य सभा में यह विधेयक पेश नहीं हो पाया था। इस विधेयक को शीतकालीन सत्र में सरकार की ओर से फिर से पेश किया गया।

नागरिकता विधेयक, 2019 फिर से क्यों पेश करना पड़ा?

संसदीय प्रक्रियाओं के नियम के मुताबिक, अगर कोई विधेयक लोकसभा में पास हो जाता है लेकिन राज्य सभा में पास नहीं हो पाता और लोकसभा का कार्यकाल समाप्त हो जाता है तो वह विधेयक निष्प्रभावी हो जाता है यानी उसको फिर से दोनों सदनों में पास कराना होगा। वहीं राज्य सभा से संबंधित नियम अलग है। अगर कोई विधेयक राज्य सभा में लंबित हो और लोकसभा से पास नहीं हो पाता और लोकसभा भंग हो जाती है तो वह विधेयक निष्प्रभावी नहीं होता है। चूंकि यह विधेयक राज्यसभा से पास नहीं हो पाया था और इसी बीच 16वीं लोकसभा का कार्यकाल समाप्त हो गया, इसलिए इस विधेयक को फिर से दोनों सदन में पास कराना पड़ा। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह कानून बन गया।

अब नए कानून में क्या है प्रावधान?

नागरिकता संशोधन कानून 2019 में अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और क्रिस्चन धर्मों के प्रवासियों के लिए नागरिकता के नियम को आसान बनाया गया है। पहले किसी व्यक्ति को भारत की नागरिकता हासिल करने के लिए कम से कम पिछले 11 साल से यहां रहना अनिवार्य था। इस नियम को आसान बनाकर नागरिकता हासिल करने की अवधि को एक साल से लेकर 6 साल किया गया है यानी इन तीनों देशों के ऊपर उल्लिखित छह धर्मों के बीते एक से छह सालों में भारत आकर बसे लोगों को नागरिकता मिल सकेगी। आसान शब्दों में कहा जाए तो भारत के तीन मुस्लिम बहुसंख्यक पड़ोसी देशों से आए गैर मुस्लिम प्रवासियों को नागरिकता देने के नियम को आसान बनाया गया है।

पटनायक ने अंत में कहा अगर मेरे बताई गई बात को पूरी तरह समझे तो नागरिकता कानून समझ आ जायेगा और मुझे लगता है अब नागरिकता कानून पर और कोई विरोध नहीं होगा और अगर विरोध करते है तो सिर्फ वोट नीति के लिए ही है

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