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पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत आज, ऐसे करें भगवान विष्णु की पूजा होगी मनोकामना पूरी

Paush Putrada Ekadashi 2024 Katha: पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत 21 जनवरी दिन रविवार को रखा जाएगा. पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखते हैं. इस बार पौष शुक्ल एकादशी तिथि 20 जनवरी को शाम 07:26 पीएम से 21 जनवरी को शाम 07:26 पीएम तक है. एकादशी व्रत के दिन व्रती भगवान विष्णु की पूजा करेंगे, उस दौरान उनको पौष पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा सुननी चाहिए. काशी के ज्योतिषाचार्य चक्रपाणि भट्ट का कहना है कि एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पौष शुक्ल एकादशी व्रत की महिमा और उसकी विधि के बारे में बताने का अनुरोध किया. तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनको पौष पुत्रदा एकादशी की कथा सुनाई और महत्व को बताया

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा
एक समय भद्रावती नगर का राजा सुकेतुमान हुआ करता था. उसका विवाह राजकुमारी शैव्या से हुआ था. उसके पास हर प्रकार की सुख और सुविधाएं थीं. उसका राज्य बड़ा ही खुशहाल था और धन-वैभव की भी कोई कमी नहीं थी. सुकेतुमान की प्रजा भी सुखी थी. राजा उनका ख्याल रखता था. धीरे-धीरे समय व्यतीत होता गया और विवाह के कुछ साल बीत गए. राजा सुकेतुमान को कोई संतान नहीं हुई. उन्होंने कई यत्न किए, लेकिन संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ.

संतान न होने के कारण सुकेतुमान और रानी शैव्या काफी दुखी थे. राजा को इस बात की चिंता खाए जा रही थी कि उनका तो कोई बेटा नहीं है. उनका पिंडदान कौन करेगा. वह इस बात को सोच सोचकर दुखी रहता. उसके मन में आत्महत्या के भाव आने लगते थे, लेकिन उसने आत्महत्या नहीं की. अब उसका मन राजकाज में नहीं लगता था, एक दिन वह सबकुछ त्यागकर जंगल चला गया.

काफी समय से पैदल चलते-चलते वह एक तालाब के पास पहुंचा और पेड़ की छांव में बैठ गया. उसने आसपास नजर डाली तो एक आश्रम देखा. वह आश्रम में गया. ऋषियों को नमस्कार करके अपना परिचय दिया. ऋषियों ने उससे जंगल में आने का कारण जानना चाहा. तब सुकेतुमान ने अपने मन की व्यथा उनसे कही.

ऋषियों ने सुकेतुमान से कहा कि पौष माह​ के शुक्ल पक्ष की एकादशी आने वाली है. उस दिन व्रत रखकर विष्णु जी की विधि विधान से पूजा करते हैं. इस व्रत को करने से पुत्र की प्राप्ति होती है. इसे पौष पुत्रदा एकादशी कहा जाता है.

ऋषियों के बताए गए उपाय को पाकर राजा खुश हो गया और महल लौट आया. पौष शुक्ल एकादशी तिथि को उसने और उसकी पत्नी ने विधि विधान से व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा की. व्रत के नियमों का पालन किया और रात्रि जागरण की. कुछ दिनों के व्यतीत होने पर रानी शैव्या गर्भवती हो गई और उसने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया. राजा पुत्र को पाकर खुश हो गया. इसी प्रकार से जो भी व्यक्ति यह व्रत करता है, उसे पुत्र की प्राप्ति होती है.

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