छत्तीसगढ़

संडे की चकल्लस – पहलवान कहता रहा कि मुझे मारना है तो जान से मार दो… अगर मैं बच गया तो तुम लोग नहीं बचोगे

आज से हम आप पाठकों के लिए संडे की चकल्लस के नाम से स्तम्भ ला रहे हैं जिसे रायपुर नगर निगम में पदस्थ श्री अजय वर्मा जी की कलम से प्रस्तुत करेंगे। अजय वर्मा एक समय के जाने माने तेज तर्रार पत्रकारों में शुमार हुवा करते थे उसके बाद उन्होंने शासकीय सेवा की शुरुआत नगर निगम में की। उनके द्वारा हर रविवार को कुछ न कुछ स्पेशल लेख लिखा जाता है जिसे हम आप सभी के सामने इस पोर्टल के माध्यम से लाएंगे।

पढ़िए इस रविवार का लेख –

सन्डे की चकल्लस

किस्सा ब्राह्मण पारा रायपुर का ( भाग -7 )

छत्तीसगढ़ के ब्राह्मणों की दो चीजें दूसरों को चकित कर देती हैं। एक है कि वे अपने नाम के साथ अपने गांव का भी नाम लिखते हैं। दूसरा है कि एक ही परिवार के लोगों के सरनेम अलग अलग देखे जाते हैं। यहां तक पिता पुत्र भी अलग अलग सरनेम लिखते हैं।

सरनेम अलग अलग लिखने का राज यह है कि पिता को आदर देते हुए उनके लिखे सरनेम का प्रयोग नहीं किया जाता। कम से कम उनके जीवित रहते तक तो कदापि नहीं। यह ठीक उसी तरह है जैसे अंचल में कई लोग पिता के जीवित रहते तक अपनी मूंछ नहीं मुड़ाते हैं। अब कागजी प्रक्रिया की बाधा होने के कारण यह चलन घट गया है और पिता पुत्र एक ही सरनेम लिखने लगे हैं। ब्राह्मणों में सरनेम वाली बाधा से बचने के लिए शर्मा लिखने का रिवाज लोकप्रिय रहा है।

अपने नाम के पीछे अपने गांव का नाम लिखने की परंपरा कब और कैसे आई, इस बारे में थोड़ा संशय है। मराठाकाल से यहां बसे महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण ज्यादातर अपना सरनेम नहीं लिखते किन्तु अपने नाम के पीछे अपने गांव का नाम जरूर लिखते हैं।

हो सकता है कि स्थानीय ब्राह्मणों ने उन्हीं से सीखा हो या फिर महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण उनसे सीखे हों। कुछ लोगों का कहना है कि करीब डेढ़ सौ साल पहले उत्तरप्रदेश से कान्यकुब्ज ब्राह्मणों का यहां आने का सिलसिला शुरू हुआ। उसी काल के आसपास राजस्थानी ब्राह्मण भी यहां आने लगे। उनसे अपने आप को अलग पहचान देने के लिए यहां के ब्राह्मणों ने अपने नाम के पीछे अपने गांव का नाम लिखना शुरू किया।

गौरतलब है कि यहां के ब्राह्मण सर्यूपारीय ब्राह्मण हैं। यह भी वजह थी कि वे अपनी अलग पहचान बनाए रखें। रायपुर के ब्राह्मण पारा में लोग उनके गांव के नाम से ही पहचाने जाते हैं। यहां गांव के नाम से बाड़े और छोटे छोटे मुहल्ले भी हैं।

इस मोहल्ले में साल 1980 के दशक के शुरुआत में एक घटना ऐसे हुई, जिसकी चर्चा अब भी होती है। आजकल हास्य के लिए कह दिया जाता है कि बारात में जब तक कोई फूफा नाराज ना हो जाए वह बारात बारात नहीं कहलाती है। एक जमाने बारातियों की भी नाराजगी की भूमिका होती थी। ऐसी ही वह बारात थी। दोनों पक्ष उलझ गए।

बात बढ़कर घटना मारपीट में तब्दील हो गई। मामला पुलिस तक पहुंच गया। दूल्हे के चाचा और मामा लोग भी गिरफ्तार किए गए। यहां इस घटना को हल्के फुल्के अंदाज में लिखा गया है। जो लोग ‘ प्रत्यक्षदर्शी ‘ रहे उनसे कई किस्से सुनने को मिलते हैं।

यहां की एक और बारात भी चर्चित रही। एक पहलवान जैसे युवक से झगड़ा हो गया। पहलवान कहता रहा कि मुझे मारना है तो जान से मार दो। अगर मैं बच गया तो तुम लोग नहीं बचोगे। फिर क्या वह बच गया मगर दूसरा पक्ष पिटाई से नहीं बच सका। पहलवान के दोस्तों ने एक को चुन चुनकर पीटा। ( क्रमशः )

साभार श्री अजय वर्मा की फेसबुक वाल से

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