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आलेख – आर्गेनिक सामानों के नाम से बेतहाशा लूट, कृषि की रीढ़ ही आर्गेनिक संसाधन – डा. चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ

मै छोटे से अभनपुर से जब भी बाहर जाता हू तो मेरे को हर समय दिल से लगता है कि हम बडे शहरों के मुकाबले बहुत अच्छी जिंदगी गुजार रहे है । मेरा मानना है कि अगर कोई छोटी जगह मे रहता है तो वो बडे घर मे रहता है पर कोई बडे जगह मे रहता है तो वो वहा उस तथाकथित छोटे फ्लैट में रहता है । दुर्भाग्य से छत्तीसगढ़ बनने के बाद से यह कांसेप्ट छत्तीसगढ़ के उन शहरों के आसपास के गांवों को भी अपने आगोश में ले लिया है। नहीं तो एक समय ऐसा था कि हमारे बरामदे इतने बडे होते थे कि बडे पद मे काम करने वाले उस शहर के बंदे के टू बीएचके या थ्री बीएचके के बराबर के होते थे । इतना खुला जीवन होने के बाद भी हमारे युवा उस शहर के लाइफ स्टाइल के मृग तृष्णा के तरफ आकर्षित हो रहे है कुल मिलाकर जो है उसे हम खोने की तरफ बढने का एक कदम कह सकते है । मेरा तो मत है कि छोटे जगह मे आप अपने संबंधो से बगैर जेब में पैसे रखे काफी समय तक काम निकाल सकते है । वहीं बडे जगहों मे तो यह नामुमकिन है। खैर मै अब अपने व्यवहारिक जिंदगी के मुद्दे पर आऊं । मुझे हर समय इस बात की तकलीफ होती है और मै उसे स्वीकार कर भी नहीं पा रहा हूं कि जो दूध अंतर सब्जी का प्राकृतिक आनंद ले रहें हैं यहां के लोग तो इससे कोसों दूर है । मुझे कहने मे कोई झिझक नहीं है कि आज भी जो वेजीटेबल फ़्रेश खा रहे है उसे यहां का युवा लाखो रूपये महीने तंनखवाह मिलने के बाद भी उसे वो नसीब नहीं है। बैगन जैसी सब्जी भी जब एक सौ बीस रूपये किलो सुना तो पैर की जमीन ही खिसक गई । हम ज्यादा से ज्यादा तीस रूपये किलो मे लेते है । यहां तो आर्गेनिक सामानों के नाम से तो बेतहाशा लूट है । जबकि हमारे कृषि की रीढ़ ही आर्गेनिक संसाधन है । कुल मिला कर बडे शहरों की बडी बात है । फिर से अपनी बात पर इतनी महंगी सब्जी पर हमारे यहां के सब्जियों के सामने बिलकुल फीकी है । पर मैंने देखा है कि इन युवाओं ने एक समझौता सा कर रखा है । वो अपने कैरियर के कारण इन छोटी चीजों को मिस करते है कि नहीं मालूम पर ऐसा लगता है कि ये इनके एक तरह से आदि से हो गये है । पर यह सब चीजों मे महंगाई समझ से परे है । कास्टिक सोडा जो हम तीस से चालीस रू तक सीमित है वो यहां अस्सी रू किलो है । मेरे को तो यह अंदर से लगने लगता है कि कम कमा कर भी हम यहा ज्यादा अच्छे से रह रहे है । हमारे यहां का तीस रू यहां के सौ रू के बराबर है। मै अभी अपने पसंदीदा विषय पर अभी तक नहीं आया था। खाने की चीजे नाश्ता आदि का और कम मूल्य में जो हम अपने यहां मिलता है उसका कोई सानी नहीं है। यहां तो वीक ऐंड पर करीब करीब बाहर खाने का रिवाज सा बन गया है । कारण है कि पांच दिनों की मैराथन भाग दौड़ और दोनों की आय उन्हे इस दिन को सेलिब्रेट करने का एक अवसर प्रदान करती हैं । जिन्हे वे खोना नहीं चाहते । पर इन दिनों यहां के फूड स्टाल इतने भीड़ भाड़ भरे रहते है कि लोग लाइन लगाकर भी खाने को मजबूर होना पड़ता है । पर जो स्वाद की दुनिया हमारे यहां है इसे तो इन लोग भी मिस करते है। कुछ नहीं “उंची दुकान फीका पकवान ” । मेरे दोस्तों यह मै हर बडे शहरों का कडवा सच बता रहा हू जहां आपको शुद्ध हवा भी और ताजी धूप मिल जाए तो आप ख़ुशनसीब है। जहां बच्चे गाय देखने के लिए तरस जाते है वहीं गांव के बच्चे इनके साथ खेलते हुए तालाब से नहा कर आ जाते है । सौ बात की एक बात छोटी जगह मे नाम ही काफी है वह ही अपने आप मे एक पत्ता है पर बडी जगह मे कितना भी बडा शख्स हो अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद में लगा रहता है इसके बाद भी उसका पडौसी तक नहीं पहचानता । मैंने एक फर्क महसूस किया है कि छोटी जगह मे अपनापन इतना रहता है कि कभी भी किसी को किसी से असुविधा महसूस नहीं होती। पर यहां तो छोटे से डिसटरबेंस मे पहले सोसायटी मे ही आपत्ति फिर थाने में आपत्ति । कुछ नहीं छोटी जगह बडा दिल वहीं बडी जगह छोटा दिल तंग दिल । यह अंतर देखा लिख दिया। बस इतना ही डा . चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ

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