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आलेख – खेती और राजनीतिक खेती का विश्लेषण, दवाई कम खाद है, जात पात, धर्म, अगडा पिछडा, दलित

डा.वाघ की वाल मे हम आज राजनीतिक खेती पर बात करेंगे । खेती और राजनीतिक खेती का मै विश्लेषण कर रहा हू जो थोड़ा-बहुत अंतर है वह भी इस लेख मे दिखेगा । सामान्यतः किसान साल मे  एक खेती करता है वही कुछ मेहनतकश लोग साल मे दो बार खेती करते है । पर यहां थोडी रियायत है यहां पांच साल मे एक बार खेती होती है । बस तैयारी का अंदाज एक सा ही रहता है । जहां जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए जमीन को हल चलाकर उपजाऊ बनाया जाता है वही यहा भी जमीन मे काम करते अपने को दिखाना पडता है । यहा पर मेहनत किसान को खेत मे करनी पडती है वही नेताओ को एसी कमरे से एसी कार से बाहर आकर अपने को काम करते लोगो को दिखाना पडता है । एक चीज सामान्य है दोनो मे पहले पैसा लगाना पडता है पर फसल इश्वर भरोसे ही रहती है । कुल मिलाकर फसल अपने उपर निर्भर नही रहती । फिर सामान्यतः किसान खेती के लिए कभी बैंक लोन या सूदखोर के उपर रहते है । पर यहा थोड़ा-बहुत अंतर है राजनीतिक किसान पहले थोड़ा-बहुत घर से लगाता है पर ऋण लेने की बेवकूफी कभी भी नही करता फिर वह पूरी तरह से जुगाड पर निर्भर रहता है । फिर एक बात और मिलती जुलती है जहां छोटे किसान स्वंय खेती करते है वही छोटे नेता भी करीब करीब स्वंय ही राजनीति कर खेती करते है । पर बडे किसान खेती तो करते है पर ज्यादातर लोग रेघा या अधिया देकर खेती करते है । अधिया फार्मूला का सीधा सीधा मतलब है आधा जमीन मालिक का वही आधा खेती करने वाले का । यहां फसल होने के बाद हिसाब हो जाता है । यहां पर भी कुछ कुछ ऐसे ही है पर पेमेंट की व्यवस्था पूरी तरह राजनीतिक ही होती है । अगर केंद्रीय नेता है या हाईकमान तो पहले वह क्षेत्र के लिए कारिंदे नियुक्त करता है । यह विश्वसनीय लोग जो उपर के लिए काम करते है तो उन्हे भी जमीन दी जाती है यही लोग बाद मे माननीय बन जाते है यही लोग विधायक मंत्री कहलाते है । यह व्यवस्था कमोबेश सभी दलो मे है । उच्च स्तरीय इसमे किसी को अगर जमीन का पट्टा या टिकट नही मिला तो भी निराश होने की जरूरत नही है यहां कृत्रिम फार्म हाउस बनाया जाता है जिसमे काबीना स्तर के निगम के पद शामिल रहते है । फिर इतनी जमीन को मंत्री विधायक लोग भी अपनी जमीन को फिर अधिया मे देते है यहा से फिर पार्षद एल्डर मेन आदि पदो का सृजन होता है । पद मिलने के बाद सब व्यवस्था अपने आप हो जाती है । जब किसान की फसल खडी होती है तो किसान इसको लेकर मंडी जाता है जहां उसके फसल का रेट तय होता है अधिकतर किसान जो ज्यादा कीमत देता है वही अपनी फसल बेचता है । कमोबेश यहां भी कुछ ऐसे ही होता है चुनाव संपन्न होने के बाद जब फसल खडी होती है यहा नगद के बदले पदो पर सौदेबाजी होती है । देश ने यहां के मंडी मे माननीयो को पूरी तरह से बदलते असलियत मे बिकते हुए देखा है । जनादेश किसी को और सत्ता मे कोई और काबिज हो जाता है । बस एक बडा अंतर यह है जहां किसान सबको खिलाकर भी वही के वही ऋण के बोझ तले रहता है यहां जो किसान कभी उधार मांग कर अपना काम चलाते लोगो ने देखा रहता है वह इतना संपन्न हो जाता है की करीब करीब वह एक राजवंश की स्थापना तो कर ही लेता है । माननीयो के बच्चे किसी कुंवर से कम नही रहते उनके अपने कानून अपने क्षेत्र मे चलते है । दुर्भाग्य यह है की शासकीय सेवक भी विनम्रता से उनकी बात मानते  है । भारत कृषि प्रधान देश है इसलिए दोनो ही जगह यह व्यवस्था बनी हुई है । यह देश लोकतांत्रिक है तो कभी भी फिर नये चेहरे राजनीति मे क्यो नही दिखाई देते । कभी-कभार ऐसा लगता है की पद के साथ पेटेंट किया हुआ है लगता है । जिस तरह किसान को खाद बीज दवाई लगती है जिससे फसल अच्छी हो सके । वैसे ही राजनीतिक किसानी मे भी खाद दवाई का उपयोग होता है । यहां की विशेषता रहती है की इनके यहां जो चीज खाद के लिए काम करती है वही कभी दवाई के रूप मे भी काम आता है । यह दवाई कम खाद है जात पात धर्म अगडा पिछडा दलित।  जब कोई सियासत दान अपने फायदे के लिए उपयोग करता है तो यह उसके लिए खाद का काम करता है यह उसके सियासत के लिए इस राजनीतिक किसान के लिए खाद है । इसके चलते जो चुनाव क्षेत्र जात पात सामाजिक गढ बन जाता है तो दूसरो की इंट्री ही नही हो पाती । पर यही अगडे पिछडे दलित के गणित मे मंत्रीमंडल से बाहर हो जाते है तो यही इनके लिए दवाई बन जाता है । जिस तरह खेत मे ट्रेक्टर आदि काम मे लाया जाता है यहा रैली मे भी उसका उपयोग होता है । यह जरूर है जो किसान है वह तरक्की नही करते पर यहा का किसान तो कितने भी छोटे पद मे हो तरक्की की कोई सीमा नही है ।  कितनी समानता है जहां किसानो को बीज खाद आदि बिजली आदि पर  रियायत मिलती है वैसे ही यहां के किसान को तो सभी चीजो मे रियायत मिलती है । जहां यहा ऋण माफी मिलती है वही सत्ता पर कुछ भी कर लो सब माफ है । आपने अपने राजनीतिक मकसद के लिए एक बंदे ने कहा था मैने तो सिर्फ सोलह लोगो को मारा है जरूरत पडती तो चालीस लोगो को मार देता । क्या हुआ कोई जवाब देही तय हुई किसी ने संज्ञान लिया कुछ नही सब माफ माननीय है । बस एक अंतर मै देख पा रहा हू यहा भारी भरकम पेंशन है जो यहा नही है पर मोदी जी ने छै हजार रूपए सालाना किया है ।  किसान फसल मे हर समय निंदई याने बन को निकालते रहता है जिससे फसल को कोई नुकसान न पहुंचे परन्तु यहां थोडा अंतर है यहां तो बन को ही बने रहने दिया जाता है फसल को ही उखाडा जाता है । इनका मानना है अच्छी फसल से अपने ही सीट को खतरा न हो जाए वही बन याने अनचाही फसल को इसलिए बढने दिया जाता है यह ही लोग इनके राजनीतिक कार्यक्रम मे जहां काम आते है वही यही लोग माहौल भी बनाते है । यह बन जैसे खेती मे असामजिक तत्व होता है वैसे यहां भी यही होता है । उल्लेखनीय है की देश का इतिहास रहा है इन राजनीतिक बन ने या असामजिक तत्वो ने कितने कांड को अंजाम दिया है । उन्हे पूरी तरह से राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था । आज उत्तर प्रदेश मे यही बन जेल मे शोभा बढा रहे है । मैने कुछ दोनो फसल की विवेचना की है ।
बस इतना ही
डा. चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ

Dr. Ramchandra Chandrakant wagh
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