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यहां अपशकुन के डर से नही होती होलिका दहन, 150 सालों से चली आ रही परंपरा

देशभर में जहां होली त्योहार की शुरुआत होलिका दहन से होती है, वहीं बालोद जिले के झलमला गांव में होली के मौके पर होलिका दहन नहीं होता है। गांव के जानकार बताते है कि यह परंपरा आज की नहीं बल्कि करीब 150 सालों से यहां चली आ रही है, जिसे आज भी यहां के ग्रामीण मानते हैं।

होलिका दहन के दूसरे दिन रंग-गुलाल और नगाड़ों के साथ होली खेलते हैं –

बालोद जिला मुख्यालय से महज 3 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम झलमला गंगा मैया स्थल के नाम से पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध है। गांव के बुजुर्ग होलिका दहन न करने के पीछे कई तरह के कारण बताते है। इस परंपरा को लेकर गांव में कई किवदंतियां है। गांव के बुजुर्ग बताते है कि होलिका दहन करने से गांव में कुछ अपशगुन हो जाएगा। आज भी ग्रामीण इस परंपरा को निभाते हुए होलिका दहन तो नहीं करते, लेकिन होलिका दहन के दूसरे दिन रंग-गुलाल और नगाड़ों के साथ होली जरूर खेलते हैं।

होलिका दहन के दिन गांव में रहता है सन्नाटा

ग्रामीण पलक ठाकुर का कहना है कि होलिका दहन के दिन पूरे गांव में सन्नाटा पसरा रहता है। इस परंपरा का खैफ ग्रामीणों में इतना है कि गांव के लोग आसपास स्थित गांवों में होने वाली होलिका दहन में भी शामिल नहीं होते।

होलिका दहन से कहीं रुठ न जाए गंगा मइया

गांव के पूर्व सरपंच कल्याण सिंह साहू का कहना कि हमें नहीं पता कि यहां पर होलिका दहन क्यों नहीं किया जाता। पूर्वजों का कहना है कि इस गांव में जब से गंगा मइया विराजमान है तब से होलिका दहन नहीं करते।

वहीं ग्रामीण राजेंद्र प्रसाद ने बताया कि बुजुर्गो से चली आ रही परंपरा को निभा रहे है। हमारे बुजुर्गों का कहना है कि कहीं गंगा मइया रुठ न जाए इसलिए होलिका दहन नहीं करते। जब से गांव में गंगा मइया विराजमान है यहां कभी सूखा अकाल या अतिवृष्टि की स्थिति नहीं बनी है।

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