गिरीश गुप्ता गरियाबंद। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में वन विभाग, पशुचिकित्सकों, वन्यजीव विशेषज्ञों और स्थानीय ग्रामीणों के सामूहिक प्रयास से एक संकटग्रस्त लॉन्ग-बिल्ड वल्चर (गिद्ध) को नया जीवन मिला है। पानी में संघर्ष करते हुए मिले इस गिद्ध का समय रहते रेस्क्यू किया गया। करीब 25 दिनों तक उपचार, पोषण और निगरानी के बाद 25 अगस्त 2026 को इसे उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के दक्षिण उदंती रेंज स्थित चोकसिल हिल्स में सुरक्षित रूप से प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया गया।
ग्रामीण की सतर्कता से शुरू हुआ रेस्क्यू अभियान
घटना 30 जुलाई 2026 की बताई गई है। धवलपुर रेंज के घटौद बांध के समीप स्थानीय ग्रामीण रामदयाल नेताम ने एक लॉन्ग-बिल्ड वल्चर को पानी में संघर्ष करते हुए देखा। पक्षी की हालत देखकर उन्होंने बिना देर किए वन विभाग को सूचना दी।
ग्रामीण की तत्काल सूचना के बाद धवलपुर रेंज का वन अमला मौके पर पहुंचा और अत्यधिक थके तथा पूरी तरह भीगे हुए गिद्ध को सुरक्षित बाहर निकाला। इस त्वरित कार्रवाई से पक्षी को समय पर आवश्यक सहायता मिल सकी।

वन शिविर में लाने के बाद पक्षी के पंखों को हॉट-एयर ब्लोअर की मदद से सुखाया गया। इसके बाद उसे भोजन, पानी और सुरक्षित आश्रय उपलब्ध कराया गया। वन विभाग ने इस पूरे अभियान में स्थानीय ग्रामीणों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया है।
प्रारंभिक रेस्क्यू टीम में रेंज असिस्टेंट दौलाल मंडले, बीएफओ इंद्रदेव सिंह ठाकुर, एएनआर/चौकीदार यतीश, एएनआर/चौकीदार संजय सहित स्थानीय ग्रामीण शामिल रहे।
अधिकारियों और पशुचिकित्सक ने किया स्वास्थ्य परीक्षण
रेस्क्यू की सूचना मिलने के बाद उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर गुरुनाथन एन., उप संचालक वरुण जैन और पशुचिकित्सक डॉ. राकेश वर्मा धवलपुर पहुंचे। टीम ने गिद्ध की स्थिति का परीक्षण किया।
स्वास्थ्य आकलन के बाद यह निर्णय लिया गया कि पक्षी को आगे के उपचार, पुनर्वास और निगरानी के लिए उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व की देखरेख में रखा जाएगा।
पशुचिकित्सक डॉ. राकेश वर्मा ने गिद्ध के स्वास्थ्य सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने पक्षी की स्थिति का परीक्षण करने के साथ-साथ पुनर्वास अवधि में आवश्यक सहायक उपचार, पोषण, पानी और स्वास्थ्य निगरानी के संबंध में मार्गदर्शन दिया।
25 दिनों तक वन रक्षक ने की लगातार देखभाल
टाइगर रिजर्व में स्थानांतरण के बाद गिद्ध को जिदार वन चौकी में रखा गया। यहां वन रक्षक ओम प्रकाश राव ने लगभग 25 दिनों तक पक्षी की नियमित और समर्पित देखभाल की।
इस दौरान गिद्ध को प्रतिदिन करीब 700 ग्राम स्वस्थ मटन, पर्याप्त पेयजल तथा निर्धारित सप्लीमेंट और दवाएं दी गईं। वन अमले द्वारा उसके भोजन व्यवहार, गतिविधियों, सजगता और सामान्य शारीरिक स्थिति पर लगातार नजर रखी गई।
वन विभाग ने वन रक्षक ओम प्रकाश राव के समर्पण की विशेष सराहना की है। लगातार करीब 25 दिनों तक की गई देखभाल ने गिद्ध को दोबारा पर्याप्त ताकत हासिल करने में मदद की।
पुनर्वास प्रक्रिया में वन्यजीव विशेषज्ञ अभिजीत शर्मा, बिलासपुर का मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। उनके सहयोग से पक्षी के स्वास्थ्य और पुनर्वास की प्रक्रिया के वैज्ञानिक आकलन में मदद मिली।

GPS/GSM टैगिंग की योजना, लेकिन उपलब्धता नहीं होने से अपनाया गया वैकल्पिक तरीका
रिहाई के बाद गिद्ध की पहचान और भविष्य में निगरानी के लिए GPS/GSM टैगिंग की संभावना पर भी विचार किया गया। हालांकि निर्धारित अवधि में आवश्यक उपकरण उपलब्ध नहीं हो सका।
इसके बाद बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS), मुंबई द्वारा उपलब्ध कराई गई बर्ड रिंग के माध्यम से गिद्ध को व्यक्तिगत पहचान दी गई। इस गिद्ध को E-12 रिंग कोड से चिन्हित किया गया।
यह पहचान भविष्य में यदि यह पक्षी दोबारा किसी निगरानी दल या शोधकर्ताओं के संपर्क में आता है तो उसकी पहचान और रिकॉर्डिंग में मददगार साबित हो सकती है।
25 अगस्त को प्राकृतिक आवास में वापस लौटा गिद्ध
करीब 25 दिनों के पुनर्वास, उपचार और निगरानी के बाद वन विभाग ने पक्षी की स्वतंत्र रूप से जीवित रहने की क्षमता का आकलन किया। स्वास्थ्य और फिटनेस संतोषजनक पाए जाने के बाद 25 अगस्त 2026 को इसे चोकसिल हिल्स, दक्षिण उदंती रेंज, उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया गया।
रिहाई के समय गिद्ध का वजन करीब 4.23 किलोग्राम था, जबकि उसकी उम्र लगभग 6 माह आंकी गई। BNHS की E-12 रिंग से पहचान किए जाने के बाद पुनर्वासित गिद्ध ने सफलतापूर्वक उड़ान भरी और अपने प्राकृतिक आवास की ओर लौट गया।
रिहाई के दौरान उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के उप संचालक वरुण जैन, पशुचिकित्सक डॉ. राकेश वर्मा, कुल्हाड़ीघाट रेंज के रेंज अधिकारी दिनेश चौधरी, बीएफओ ओम प्रकाश राव, बीएफओ सूर्यदेव जगतवंशी, ड्रोन ऑपरेटर मनीष राजपूत तथा ट्रैकर्स गौकरण, नीरू नेताम, दीपक निर्मलकर, योनेश यादव, ओंकार यादव और दामरूधर यादव मौजूद रहे।
एक गिद्ध को बचाना क्यों है महत्वपूर्ण?
लॉन्ग-बिल्ड वल्चर यानी गिद्ध को पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। गिद्ध मृत पशुओं के शवों को तेजी से हटाकर प्राकृतिक स्वच्छता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा वे पोषक तत्वों के प्राकृतिक चक्र और पारिस्थितिक संतुलन में भी योगदान देते हैं।
गिद्धों की संख्या में कमी को लेकर लंबे समय से संरक्षण की जरूरत महसूस की जाती रही है। ऐसे में एक संकटग्रस्त गिद्ध को बचाकर उसे स्वस्थ करने और दोबारा जंगल में छोड़ने की कार्रवाई केवल एक पक्षी के संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संबंधित प्रजाति और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
ग्रामीणों से लेकर वन अमले तक सभी की रही भूमिका
वन विभाग के अनुसार इस सफलता का श्रेय किसी एक व्यक्ति या संस्था को नहीं दिया जा सकता। यह स्थानीय ग्रामीणों, अग्रिम पंक्ति के वन कर्मचारियों, पशुचिकित्सकों, वन्यजीव विशेषज्ञों, उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के अधिकारियों, बीएफओ, ट्रैकर्स और तकनीकी कर्मचारियों के सामूहिक प्रयास का परिणाम है।
इस पूरे अभियान की शुरुआत ही एक ग्रामीण की सतर्कता से हुई। यदि रामदयाल नेताम ने पानी में संघर्ष करते पक्षी को देखकर तत्काल वन विभाग को सूचना नहीं दी होती, तो स्थिति गंभीर हो सकती थी।
इस घटना ने यह भी दिखाया कि वन्यजीव संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। जंगल और उसके आसपास रहने वाले ग्रामीण वन्यजीवों की गतिविधियों और उनकी स्थिति को सबसे पहले देख सकते हैं। ऐसे में उनकी जागरूकता और वन विभाग के साथ तत्काल समन्वय कई बार वन्यजीवों की जान बचाने में निर्णायक साबित हो सकता है।
घाटाटौद के समीप पानी में संघर्ष कर रहे गिद्ध की पहचान से शुरू हुआ यह अभियान रेस्क्यू, पशुचिकित्सकीय परीक्षण, 25 दिनों की समर्पित देखभाल, वैज्ञानिक पहचान और अंततः प्राकृतिक आवास में सफल रिहाई तक पहुंचा। 25 अगस्त को E-12 रिंग से चिन्हित गिद्ध का खुले जंगल में उड़ान भरना इस संरक्षण अभियान की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि रही।

