हाईकोर्ट ने कहा- उच्च पद का प्रभार देना सक्षम प्राधिकारी का अधिकार, वरिष्ठता के साथ उपयुक्तता और प्रशासनिक जरूरत भी महत्वपूर्ण
बिलासपुर/रायपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने गरियाबंद जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) के प्रभार से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी की केवल वरिष्ठता उसे अपने से ऊंचे पद का प्रभार पाने का कानूनी अधिकार नहीं देती। उच्च पद का प्रभार सौंपते समय अधिकारी की उपयुक्तता, अनुभव, प्रशासनिक आवश्यकता और अन्य परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जा सकता है।
मामला गरियाबंद जिला शिक्षा अधिकारी के प्रभारी पद से जुड़ा है। छुरा में ब्लॉक शिक्षा अधिकारी के पद पर कार्यरत किशुन लाल मतावाले ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर 10 जून 2026 को जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनसे कनिष्ठ अधिकारी राजेश चंद्राकर को गरियाबंद जिला शिक्षा अधिकारी का प्रभारी बनाया गया था।
याचिकाकर्ता ने क्या कहा?
याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट में बताया गया कि वह शिक्षा विभाग में वर्ष 1995 से कार्यरत हैं और प्रधानाचार्य तथा ब्लॉक शिक्षा अधिकारी के रूप में पर्याप्त अनुभव रखते हैं। उनका दावा था कि संबंधित संवर्ग में वह राजेश चंद्राकर से वरिष्ठ हैं और सेवा अवधि पूरी होने के कारण उन्हें जिला शिक्षा अधिकारी का प्रभार दिया जाना चाहिए था।
याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि उच्च पद का प्रभार सौंपने को लेकर सरकार की ओर से जारी निर्देशों का पालन नहीं किया गया और उनसे कनिष्ठ अधिकारी को जिम्मेदारी दे दी गई। उन्होंने इस संबंध में 20 जुलाई 2026 को सक्षम अधिकारियों के समक्ष अभ्यावेदन भी दिया था।
सरकार ने किया विरोध
राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि केवल वरिष्ठता के आधार पर याचिकाकर्ता जिला शिक्षा अधिकारी के प्रभारी पद पर नियुक्ति का दावा नहीं कर सकते।
सरकार की ओर से बताया गया कि राजेश चंद्राकर पात्र अधिकारी हैं और प्रधानाचार्य पद पर पदोन्नति के बाद उन्हें गरियाबंद जिला शिक्षा अधिकारी का वर्तमान प्रभार सौंपा गया है।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने गरियाबंद कलेक्टर के 6 जून 2025 के पत्र का भी हवाला दिया। इसमें याचिकाकर्ता के खिलाफ सरकारी नियमों और निर्देशों के कथित उल्लंघन तथा शासकीय दायित्वों के निर्वहन में लापरवाही संबंधी टिप्पणियों का उल्लेख किया गया था। कलेक्टर की ओर से उनके खिलाफ निलंबन और विभागीय जांच सहित अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रस्ताव भेजे जाने की बात भी कोर्ट के सामने रखी गई।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता केवल संवर्ग में वरिष्ठ होने के आधार पर जिला शिक्षा अधिकारी के वर्तमान प्रभार पर अपना कोई कानूनी या प्रवर्तनीय अधिकार साबित नहीं कर सके।
कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई नियम उसके सामने नहीं लाया गया, जिसके तहत वरिष्ठ कर्मचारी को ही अनिवार्य रूप से उच्च पद का प्रभार देना जरूरी हो। सिर्फ वरिष्ठता अपने आप में उच्च पद का प्रभार पाने का पूर्ण अधिकार नहीं देती।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जिला शिक्षा अधिकारी का प्रभार एक अस्थायी व्यवस्था है। सक्षम प्राधिकारी द्वारा राजेश चंद्राकर को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है और याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि प्रभार सौंपने की प्रक्रिया किसी वैधानिक नियम या बाध्यकारी निर्देश का उल्लंघन करती है।
वरिष्ठता के साथ उपयुक्तता भी जरूरी
हाईकोर्ट ने कहा कि उच्च पद का प्रभार सौंपते समय केवल वरिष्ठता ही निर्णायक नहीं होती। अधिकारी की समग्र उपयुक्तता, अनुभव, प्रशासनिक आवश्यकताओं और अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों को भी देखा जा सकता है।
कोर्ट ने माना कि वरिष्ठता को अधिकारी की उपयुक्तता का स्वतः विकल्प नहीं माना जा सकता। मामले में 10 जून 2026 के आदेश में कोर्ट को कोई अवैधता, मनमानी या गंभीर त्रुटि नजर नहीं आई।
इसके बाद हाईकोर्ट ने किशुन लाल मतावाले की याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया। यह आदेश 11 अगस्त 2026 को पारित किया गया।
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