गुजरात हाईकोर्ट (Photo Credits: Wikimedia Commons)
अहमदाबाद: वैवाहिक संबंधों में शारीरिक स्वायत्तता और सहमति पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए गुजरात उच्च न्यायालय (Gujarat High Court) ने कहा है कि पति और पत्नी (Husband And Wife) के बीच यौन संबंध (Sex) पूरी तरह सहमति पर आधारित होने चाहिए. न्यायमूर्ति दिव्येश जोशी (Justice Divyesh Joshi) की पीठ ने स्पष्ट किया कि सहमति के बिना किया गया ‘अप्राकृतिक कृत्य’ (Unnatural S*x) साथी के लिए गहरा मानसिक और शारीरिक आघात (Trauma) होता है. यह टिप्पणी कोर्ट ने उस व्यक्ति की जमानत याचिका खारिज करते हुए की, जिस पर अपनी पत्नी के साथ अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने और शारीरिक क्रूरता करने का आरोप है. यह भी पढ़ें: Gujarat HC Bomb Threat: गुजरात हाईकोर्ट को बम से उड़ाने की धमकी, हड़कंप के बीच सर्च ऑपरेशन जारी (Watch Video)
जमानत याचिका खारिज करने का आधार
यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध), 498A (पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता) और 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना) के तहत दर्ज किया गया था. आरोपी पति ने अदालत से नियमित जमानत की गुहार लगाते हुए तर्क दिया था कि ये आरोप बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं और यह केवल एक घरेलू विवाद है.
न्यायमूर्ति जोशी ने इन तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि आरोपों की प्रकृति गंभीर है. कोर्ट ने टिप्पणी की कि विवाह की पवित्रता किसी भी साथी को दूसरे पर अपनी इच्छा थोपने का लाइसेंस नहीं देती है. अदालत ने माना कि पीड़ित की गरिमा का उल्लंघन और उसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
विवाह और सहमति का कानूनी पक्ष
अदालत ने अपने फैसले में आपसी सम्मान पर जोर देते हुए कहा कि वैवाहिक संस्था साझा सहमति पर टिकी होती है, न कि एक साथी के शरीर के दूसरे के अधीन होने पर.
अदालत ने कहा, ‘पति और पत्नी के बीच यौन संबंध सहमति से होने चाहिए.’ बेंच ने आगे जोड़ा कि जब ‘अप्राकृतिक’ माने जाने वाले कृत्यों के लिए बल का प्रयोग किया जाता है, तो यह एक स्वस्थ वैवाहिक रिश्ते की सीमा को पार कर जाता है और वर्तमान कानूनों के तहत आपराधिक आचरण की श्रेणी में आता है.
धारा 377 और वैवाहिक बलात्कार पर बहस
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश में ‘मैरिटल रेप’ (वैवाहिक बलात्कार) को अपराध घोषित करने और धारा 377 की वैधता पर गहन कानूनी बहस चल रही है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में आपसी सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था, लेकिन धारा 377 उन मामलों में अब भी लागू होती है जहां अप्राकृतिक कृत्य ‘बिना सहमति’ के किए गए हों.
गुजरात हाई कोर्ट ने इस मामले में ‘सहमति की कमी’ को प्राथमिक कारक माना. अदालत ने दोहराया कि विवाह किसी भी साथी को जबरदस्ती किए गए अप्राकृतिक अपराधों के आरोपों से सुरक्षा (Immunity) प्रदान नहीं करता है. यह भी पढ़ें: Yusuf Pathan को Gujarat HC से बड़ा झटका, सरकारी जमीन तुरंत खाली करने का आदेश; जानें क्या है पूरा मामला?
व्यापक सामाजिक और कानूनी प्रभाव
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि गुजरात हाई कोर्ट का यह रुख उन अदालती फैसलों की कड़ी में एक और महत्वपूर्ण अध्याय है जो विवाह के भीतर महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता की वकालत करते हैं. जमानत नामंजूर करके अदालत ने यह संकेत दिया है कि विवाह के भीतर यौन आघात से जुड़े आरोपों को अत्यधिक गंभीरता से लिया जाएगा और जांच के दौरान शिकायतकर्ता की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी.

